Home Blog

तीव्र रोग (acute disease) होने का कारण

0
acute disease

तीव्र रोग (acute disease) होने का कारण तीव्र रोग आने पर मानव माँ प्रकृति के विधान को न अपनाकर मोटे तौर पर तीन तरह की गलतियाँ करता हैं?

पहली गलती अपने दैनिक कार्य में लगे रहना तथा अपनी अवस्थता पर ध्यान ही न देना। व्यक्ति दर्द नाशक उत्तेजन पदार्थ लेकर दैनिक कार्य में लग जाता हैं। क्योंकि उसका मन काम धंधे को अधिक महत्व देता हैं।

ऐसा करने से उसका दैनिक कार्य तो चल जाता हैं, परन्तु शरीर के अंदर की सफाई का काम रुक जाता हैं। तीव्र रोगों की अवस्था में शरीर अपनी सफाई एक नियमित सिद्धांत के आधार पर करता हैं जो कि इस प्रकार हैं,

शक्ति वितरण का सिद्धांत माँ प्रकृति के इस रहस्य को गहराई से समझना हैं। जैसे,जब हमारे घर में सफेदी, रंग रोगन विशेष सफाई का कार्य चलता हैं तब हमारा समय और शक्ति अधिक लगते हैं।

और हमारे रोजाना के कई काम बाधित हो जाते हैं। जैसे हमारे घरों में इनवर्टर लगे होते हैं। बिजली जाने की अवस्था में इनवर्टर की शक्ति सीमित होने के कारण हम केवल पंखे और ट्यूबें चलाते हैं।

अगर किसी विशेष परिस्थिति में टी.वी या फ्रिज चलाना पड़ जाए तो पंखे ट्यूबें बंद करनी पड़ती हैं। ठीक ऐसे ही तीव्र रोगों का बुखार, जुखाम, उल्टी, दस्त, नजला, आदि की अवस्था में हमारी जीवनी शक्ति को जो हमें एक दिन के लिए मिलती हैं,अंदर की विशेष सफाई के लिए लगा दिया जाता हैं और हमारी टाँगों- बाहों में कमजोरी महसूस होती हैं।

इस अवस्था में अगर अधिक परिश्रम वाला काम न किया जाय और यथा संभव विश्राम किया जाय तो केवल दो-तीन दिन में अंदर की सफाई हो जाने से हाथ -पैर आदि की शक्ति वापस लौट आती हैं। माँ प्रकृति के इस रहस्य को शक्ति वितरण का सिद्धांत कहा जाता हैं।

दूसरी गलती तीव्र रोग की अवस्था में भोजन लेना। तीव्र रोगों नजला, जुखाम, उल्टी, दस्त, बुखार आदि की अवस्था में माँ प्रकृति द्वारा व्यक्ति की भूख को मार दिया जाता हैं। माँ प्रकृति कोई भी रोग बिना चेतावनी दिए नहीं भेजती। आमतौर पर हार्ट अटैक होने से वर्षो पहले एंजाईना पेन के रूप में चेतावनी दी जाती हैं। यह व्यक्ति पर निर्भर हैं कि वह उसको समझे या न समझे और संभले या न संभले।

तीव्र रोग की अवस्था में माँ प्रकृति द्वारा व्यक्ति के मुहँ के स्वाद को भी बदल दिया जाता हैं। हर पदार्थ का स्वाद बदला-बदला सा लगता हैं। पानी भी कड़वा लगता हैं। अर्थात पानी भी ठीक से नहीं पच सकता तो भोजन कहा से पचेगा? जब हमें घर वाले कहते हैं या मानते हैं कि भोजन में शक्ति होती हैं और हम भोजन ले लेते हैं तो वही प्राणशक्ति जो विशेष सफाई के लिए अंदर लगी हुई थी।

वह भोजन को हजम करने में लग जाती जिससे विशेष सफाई के काम में रुकावट आ जाती हैं। इस बात को प्रमाणित करने के लिए सभी जीव-जन्तु हैं। मानव के अलावा किसी जीव के लिए भी अस्पताल, दवाइयां, प्रयोगशालाएं या जांच नहीं हैं। मानव के अलावा सभी जीव-जन्तु स्वस्थ रहते हैं। क्या विचारणीय विषय नहीं हैं कि मानव के लिए यह सब कुछ होते हुए भी रोगी रहता हैं? ऐसा क्यों?

जिन लोगों ने अपने घर में गाय, भैंस, कुत्ता या बिल्ली पाली हैं उनको यह अच्छी तरह मालूम हैं कि अगर गाय को बुखार हो जाएँ या चोट लग जाए तो बढ़िया हरी घास भी नहीं खाती। अर्थात पशु-पक्षियों को भी अंत प्रवृति से महसूस हो जाता हैं

कि ऐसी अवस्था में उसकी पूरी प्राणशक्ति अंदर की मरम्मत करने की तरफ मुड़ जाती हैं, पर उस समय भोजन करने से वह प्राणशक्ति उस भोजन को पचाने में लग जाती हैं जिससे चोट या बुखार को ठीक करने का काम रुक जाता हैं। माँ प्रकृति के इस निर्देश को भूलकर मानव रोग की अवस्था में भी हमेशा की तरह भोजन करता रहता हैं।

तीसरी गलती दवाई लेना। जब कभी व्यक्ति रात में किसी दावत पार्टी आदि में जाते हैं, तो वहाँ पर सभी तरह के व्यंजनों को चख-चख कर भूख से ज्यादा खा लेते हैं। इस तरह भोजन भली भांति पचता नहीं

परिणामस्वरूप प्राणशक्ति उस गंदगी को अगली सुबह दस्त के रूप में बाहर निकालने का प्रयास करती हैं। उसी समय व्यक्ति डॉक्टर के पास जाकर कहता हैं कि रात को पार्टी में उल्टा-सीधा खा लिया था,

इसलिए दस्त लग गये अब दस्त बंद करने की दवाई दे दीजिए इस तरह वह गंदगी को रोकने की दवाई माँगता हैं। परिणाम स्वरूप वही गंदगी कब्ज का रूप धारण करती हैं और आगे चलकर बवासीर बनती हैं।

जुखाम की अवस्था में माँ प्रकृति पहले के चार रास्तों के अलावा एक पांचवा रास्ता अपनाती हैं। बलगम को नाक के द्वारा बाहर निकाला जाता हैं। हम अपने दैनिक जीवन में देखते हैं

की नजला, जुखाम, गला खराब, बुखार, कनपेड फोड़ा-फुंसी आदि तीव्र रोग बच्चों को अधिक होते हैं। बच्चे का शरीर निर्मल होता हैं। जैसे सफेद कपड़े पर गंदगी जल्दी दिखाई देती हैं। इसकी अपेक्षा रंगदार कपड़े पर गंदगी होने पर भी कम दिखाई देती हैं।

ठीक ऐसे ही बच्चे का शरीर निर्मल होने का कारण उसको तुरंत कोई न कोई तीव्र रोग आ जाता हैं। इसलिये पुराने समय में या आज भी गाँवों में बच्चों की नाक अधिकतर बहती मिलती हैं।

इसकी अपेक्षा शहरों में हम सब पढ़े-लिखे और समझदार से हैं डॉक्टर के पास जाकर फ़ीस देने की जरूरत नहीं समझते। घर से ही कोई न कोई जुखाम की पीने वाली दवा एक चम्मच बच्चे को पिला देते हैं और बच्चे की नाक बहती बंद हो जाती हैं

क्या पहले के दिनों में हमारे बुजुर्गो को बच्चों का पालन-पोषण नहीं करना आता था? ऐसा नहीं हैं। जब हम, जुखाम के द्वारा जो मल बाहर निकालना था, उस गंदगी को कोई दवाई लेकर अंदर ही दबा देते हैं

तो वही गंदगी आगे चलकर मंद रोग या मारक रोग अर्थात खाँसी, दमा, टीबी या कैंसर का रूप का धारण कर लेती हैं। अगर जुखाम के समय जुखाम की, दस्त के समय दस्त की और बुखार के समय बुखार की दवाई न खाई जाए तो कैंसर जैसा मारक रोग नहीं हो सकता।

तीव्र रोगों का समाधान – पेट की गीली पट्टी पेड़-पौधों के पत्ते सूखने पर पानी उनकी जड़ में डालने से पूरे पेड़- पौधों को लाभ होता हैं पत्तो के ऊपर डालने से नही ऐसे ही मानव शरीर की जड़ तो पेट हैं

हमारे शरीर के महत्वपूर्ण अंग (VITAL ORGANS) और पाचन क्रिया सम्बन्धी अंग जैसे कि जिगर (LIVER) आमाशय, छोटी आंत, बड़ी आंत,गुर्दे, पित्त की थैली (GALL BLADDER) तिल्ली, (pancreas) आदि पेट में ही हैं।

पचने के बाद ही पौष्टिक भोजन से पूरे शरीर को पोषण तत्व मिलते हैं। अगर पेट अर्थात् पाचन क्रिया ठीक होगी तो पूरा शरीर तथा सभी रोग अपने आप ठीक हो जायेंगे। पेट की पट्टी लगाने से उपरोक्त बताए गये सभी महत्वपूर्ण अंगों की कार्यकुशलता बढ़ती हैं।

सूजन उतर जाती हैं, आँतों में रुका हुआ मल निकल जाता हैं पेट में रुकी हुई गंदी वायु पट्टी लगाते ही निकलने लगती हैं। जो अनुभव तुरंत और प्रत्यक्ष होता हैं। स्वस्थ व्यक्ति को भी लाभ होता हैं।

यह भी पढ़े⇒ घर पर जल को शुद्ध (Water purification) करने के 4 तरीके⇐

पट्टी लगाने की विधि – एक सफेद मोटा सूती कपड़ा (चादरनुमा) लगभग पूरे पेट पर आ जाना चाहिए इतना लीजिए और कपड़े की लम्बाई को चार तहकर ले। और साधारण ठंडे पानी में भिगोकर तथा निचोड़कर व्यक्ति के पूरे पेट पर नाभि को बीच में रखकर आधी पट्टी नाभि से ऊपर और आधी नाभि से नीचे होनी चाहिए। कमर से घुमाकर लपेट लें जैसे नहाने के बाद तौलिया लपेटते हैं।

यदि सर्दी बहुत हैं अथवा रोगी बहुत कमजोर हैं तो गीली पट्टी के ऊपर कोई पतला तौलिया या ऊनी कपड़ा लपेटे आवश्कता के अनुसार ऊपर से कपड़े पहन कर अपना कोई भी दैनिक कार्य या आराम करें। यह पट्टी दीन में तीन या चार बार लगाएं। पट्टी भोजन से पहले लगाना अधिक अच्छा हैं परन्तु ऐसा संभव न हो तो दिन में किसी भी समय लगाई जा सकती हैं। केवल इस बात का ध्यान रखना हैं

कि जिस समय पट्टी लगी हुई हो, उस समय कुछ खाना -पीना नहीं हैं। यदि खाना ठीक से न पचता हो तो पट्टी को खाना खाने के बाद लगाने पर खाना हजम करने में सहायता मिलती हैं। आपातकाल स्थिति एवं तीव्र रोग की अवस्था में शरीर पर बंधी गीली पट्टी के भाग को वायु के संपर्क में रहने दें।

अर्थात् गीली पट्टी को सामान्य कपड़े से न ढकें। पाकृतिक चिकित्सा पद्धतियों में गीली पट्टी का प्रयोग आमतौर पर बताया जाता हैं। परन्तु आजकल के व्यस्त जीवन में उपयुक्त मिट्टी को ढूँढना, घर में रखना, साफ़ करना असुविधाजनक हैं मिट्टी की पट्टी में भी विशेष लाभ तो पानी से ही होता हैं यही लाभ गीले कपड़े की पट्टी से लिया जा सकता हैं। यह करने में भी आसान हैं।

⇒ पेट साफ़ होगा एक ही बार में बिना किसी दवा के/Stomach will clear at once without any medicine⇐ click करे

जोंकों (treatment of leeches) से हो रहा गंभीर रोगों का उपचार

0
treatment of leeches

जोंकों (treatment of leeches) से हो रहा गंभीर रोगों का उपचार जोंक दूषित रक्त को ही चूसती है। एक बार में जोंक शरीर से 5 मिलीलीटर खून चूस लेती है। यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक प्रभावित अंग से दूषितरक्त को पूरी तरह चूस नहीं लिया जाता।

जोंक का नाम आते ही एक तरह का डर सा लग जाता हैं ऐसे में अगर बहुत सारी जोंक आपकी बॉडी पर हो और खून चूस रही हो तो कैसे रिएक्ट करेंगे आप? अगर ये लीच थेरेपी हैं तो आप ऐसा ख़ुशी से करवाएंगे जी हाँ,

लीच थेरेपी एक ऐसा इलाज हैं जिससे जोंक आपकी बॉडी पर खून चूसने के लिए छोड़ा जाता हैं। इसका बहुत सारी बीमारियों जैसे कैंसर, अर्थराइटिस शरीर के किसी भाग के जुड़ने में अच्छा यूज हो सकता हैं,

2500 साल पहले ग्रीक के लोग इस थेरेपी का उपयोग बॉडी के खराब रक्त को निकालने के लिए करते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि खून चूसने वाली जोंक आपकी लाइलाज बीमारियों को ठीक कर सकती हैं।

इसे जोंक थेरेपी कहते हैं। जोंक से उपचार की विधि को आयुर्वेद में जलौकावचारण विधि की संज्ञा दी जाती हैं। चिकित्सा विज्ञान में इस विधि को लीच थैरेपी भी कहा जाता हैं। यह आयुर्वेद चिकत्सा पद्धति में हो रहा हैं।

आयुर्वेद चिकत्सा में जोंक थेरेपी से रोगों का इलाज किया जा रहा हैं। चिकित्सा विज्ञान में इस विधि को लीच थेरेपी कहा जाता हैं। चिकत्सक बताते हैं की जोंक थेरेपी लाइलाज बीमारियों में कारगर साबित हो रही हैं।

जोंक थेरेपी से कई तरह के त्वचा रोगों का इलाज किया जा रहा हैं। यह (jonk) मरीजों का खून चूसता हैं,जैसे चोट लगने पर या किसी तरह की बिमारी होने पर लीच (जोंक) थेरेपी में जोंक को आपकी बॉडी पर परेशानी की जगह छोडा जाता हैं,

जोंक के तीन जबड़े और 100 दांत होते हैं। जिससे वो बॉडी में से खून चूसती हैं,एक जोंक अपने वजन से 10 गुना ज्यादा खून इंसान की बॉडी में से चूस सकती हैं,बॉडी पर लगते ही ये एक तरह का केमिकल बॉडी में डाल देती हैं। सिर, चेहरे, हाथ, पेट, पैर से खून चूसता हैं खून चूसता देख आप चौंक जायेंगे पर रोगी को काफी राहत मिलेगी।

आयुर्वेद चिकत्सा के अनुसार बताया गया हैं कि जोंकों को प्रभावित अंगों के ऊपर छोड़ दिया जाता हैं। वः मरीज के अंग पर वाय आकार बनाकर चिपकती हैं और शरीर से गंदे खून को चूस लेती हैं। इससे किसी प्रकार के निशान भी नहीं रहते हैं।

जोंक अशुद्ध रक्त को चूसकर शरीर में हिरुड़ीन नाम का एंजाइम डाल देती हैं यह हिरुडीन रक्त में थक्के जमने से रोकता हैं और पहले से बने रक्त के थक्कों को घोल देता हैं। इससे रक्त शुद्ध हो जाता हैं और रक्त का संचार तेजी से होने लगता हैं।

इससे शरीर में अधिक ऑक्सीजन वाला रक्त बहने लगता हैं। और शरीर धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगता हैं। एक बार में जोंक शरीर से 5 मिलीलीटर रक्त चूस लेती हैं।यह प्रक्रिया तब तक चलती हैं

जब तक प्रभावित अंग से दूषित रक्त पूरी तरह चूस नहीं लिया जाता दूषित रक्त की समाप्ति से स्वच्छ रक्त प्रवाह होता हैं,जिससे जख्म जल्दी भरते हैं। इससे चर्म रोग जैसे दाद, घाव,(नासूर) नसों का फूलना, कील-मुहांसे, सिर पर से किसी एक जगह से बाल कम हो जाना जैसी कई बीमारियों का इलाज सफलतापूर्वक किया जा रहा हैं।

जोड़ो के दर्द को जड़ से खत्म करें जोंक – यदि आप जोड़ो के दर्द से परेशान हैं और पेन किलर के सहारे जीवन काट रहे हैं तो अपनी आदत तुरंत बदल डालें। जरूरत से ज्यादा पेन किलर का उपयोग करने से किडनी भी खराब हो सकती हैं।

जोड़ों में दर्द से पीड़ित मरीजों के लिए सनसे कष्टकारी समय ठंड का होता हैं। ऐसे में उनकी समस्या कई गुना ज्यादा हो जाती हैं बहुत से मरीज तो ऐसे होते हैं जो अपनी नियमित दिनचर्या के लिए भी दूसरों पर आश्रित रहते हैं।

जिनके पास आर्थिक संसाधन होते हैं वह ज्वाइंट रिप्लेसमेंट करा लेते हैं,लेकिन जिनके लिए यह संभव नहीं होता हैं। उसके लिए आयुर्वेद से ही राहत मिलती हैं।आयुर्वेदिक चिकित्सा में जोंक का प्रयोग करके जोड़ों के दर्द को भगाया जा रहा हैं,

यह भी पढ़े ⇒ कोलेस्ट्रोल(cholesterol) का काल है ये 7 सब्जियां ! ⇐ 

इससे शरीर पर किसी प्रकार का साइड इफैक्ट भी नहीं होता हैं। और मरीजों को लम्बे समय तक आराम मिल जाता हैं।आयुर्वेद मरीजों के लिए यह बहुत लाभप्रद चिकत्सकीय पद्धति हैं। जोड़ों में दर्द या सूजन क समस्या हो जाती हैं।

तो प्रभावित स्थानों से जहरीले तत्वों को बाहर निकालने के लिए जोंक का प्रयोग किया जाता हैं। जोंक के लार्वा में दर्द को कम करने की ताकत होती हैं। एक तरफ तो शरीर के बीमार हिस्से से वह जहरीले तत्वों को चूस कर निकाल देते हैं।

वहीं दूसरी तरफ जोंक के लार्वा से मरीजों को दर्द में राहत मिल जाती हैं। मरीज के शरीर पर जहाँ भी दर्द हैं उस स्थान 10 मिनट तक जोंक को प्रभावित हिस्से पर लगाया जाता हैं,इतनी देर में वह अपना काम कर देती हैं।

पहले जोंक की पहचान करें – सबसे पहले जोंक की पहचान करनी होती हैं, यदि गंदे पानी की जोंक का उपयोग किया जायेगा तो मरीज को फायदे की जगह नुकसान होगा। ऐसे मे यह पता होना जरूरी हैं कि जोंक साफ़ पानी में रहनी वाली हो।

⇒ बैड कोलेस्ट्रोल का काल है ये 7 सब्जियां | Bad Cholesterol Will Be Gone With These 7 Vegetables. ⇐ click करे 

मोबाइल फोन (mobile radiation) के बिना हमारे जीवन की कल्पना

0
mobile-radiation

मोबाइल फोन (mobile radiation) के बिना हमारे जीवन की कल्पना भी नहीं कर पाते हैं। आदत ऐसी बन गई हैं की जब कॉल नहीं होता, तो भी हमें लगता हैं कि घंटी बज रही हैं।

यह घंटी दरअसल खतरे की ही हैं। आजकल हर किसी के हाथ में मोबाइल फोन का होना बहुत ही आम बात हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि आप जिस मोबाइल फोन से देश दुनिया में लोगों से बातें कर रहे हैं।

वह आपके लिए जानलेवा भी साबित हो सकता हैं एक्सपर्ट्स का कहना हैं कि मोबाइल के अधिक इस्तेमाल से रेडिएशन (mobile radiation) का खतरा बढ़ जाता हैं जिससे लोगों के स्वास्थ्य संबंधी कई गंभीर समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।

आपको बता दे की आजकल शहर से लेकर गाँवों में भी हर एक व्यक्ति मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहा हैं, और उनका मोबाइल से दूरी रखना अब आसान काम नहीं रह गया हैं।

मोबाइल के खतरनाक रेडिएशन से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। इसको जानने के बावजूद लोगों में मोबाइल के लिए दीवानगी बढ़ती जा रही हैं। जानकारों का कहना हैं की कुछ ख़ास बातों को ध्यान में रखा जाएँ

तो मोबाइल फोन के रेडिएशन और उसके दुष्प्रभाव से बचा जा सकता हैं। रेडिएशन से डायबिटीज, बीपी, सिर दर्द, सिर में झनझनाहट, नींद न आना, आँखों में ड्राइनेस सहित कैंसर और ब्रेन ट्यूमर जैसी गंभीर बिमारी होने की आशंका होती हैं।

मोबाइल रेडिएशन में माईक्रोवेव्स होती हैं। जो बॉडी के सेल्स में वाइब्रेशन करता हैं, यह वाइब्रेशन कोशिकाओं के अवयवों को नष्ट कर देता हैं। टावर से निकलने वाले रेडिएशन के गंभीर मुद्दो को लेकर पिछले कई सालों से पत्रिका समूह आवाज उठाता रहा हैं।

अलग-अलग माध्यम से जनता को जागरूक करता रहा हैं,पत्रिका की पहल से लोग जागरुक होते हुए टावर्स के विरोध में आगे आए, मोबाइल टावर से निकलने वाले रेडिएशन पर दुनिया भर में बहस चल रही हैं, लगातार शोध किए जा रहे हैं,

रेडिएशन से होने वाले नुकसान को देखते हुए मोबाइल टावर्स को हटाने की माँग तेज हो गई हैं। सरकार की तरफ से कराए गए शोध और अध्ययनों में मोबाइल रेडिएश से ब्रेन ट्यूमर होने की आशंका ज्यादा हैं,जबकि मोबाइल इंडस्ट्री से जुड़ी कंपनिया जब ऐसे अध्ययन तो शोध के नतीजों में आशंका को कम बताया जाता हैं।

24 घंटे रेडिएशन के साए में लोग 2004 में इजरावली शोधकर्ताओं ने एक शोध किया, जिसके बाद उन्होंने बताया की जो लोग लम्बे समय से स्थापित मोबाइल टावर के 350 मीटर के दायरे में रहते हैं।

उन्हें कैंसर होने की आशंका चार गुना बढ़ जाती हैं, 2004 में जर्मन के दायरे में एक दशक से रह रहे लोगों में अन्य लोगों के मुकाबले कैंसर होने का अनुपात ज्यादा पाया जाता हैं। जानकारों का कहना हैं कि मोबाइल से अधिक परेशानी उसके टावर्स से हैं,

क्योंकि मोबाइल का इस्तेमाल हम लगातार नहीं करते,लेकिन टावर लगातार 24 घंटे रेडिएश फैलाते हैं। मोबाइल पर हम घंटे भर बात करते हैं तो उसके हुए नुकसान की भरपाई के लिए हमें 23 घंटे मिल जाते हैं।

जबकि टावर के पास रहने वाले उससे लगातार निकलने वाली तरंगों की जद में रहते हैं,विशेषज्ञ दावा करते हैं कि अगर घर के सामने टावर लगा हैं तो उसमें रहने वाले लोगों को 2-3 साल के अंदर सेहत से जुड़ी समस्याएँ शुरू हो सकती हैं।

मोबाइल रेडिएशन क्या होता हैं? मोबाइल फोन से निकलने वाला रेडिएशन गर्भ में पल रहे बच्चे के ग्रोइंड टिश्यु को नुक्सान पहुँचा सकता हैं मोबाइल रेडिएशन बच्चों को हाइपरएक्टिव बना देती हैं,

mobile radiation

जो मानसिक और भावनात्मक असर डालती हैं। मोबाइल फोन के अत्यधिक इस्तेमाल से कोशिकाओं में तनाव पैदा होता हैं। इसके कारण कैंसर का खतरा होता हैं। मोबाइल फोंस से निकलने वाली रेडिएशन और किरणें पक्षियों और पर्यावरण के साथ-साथ हमारी सेहत के लिए भी बेहत खतरनाक होती हैं।

इन हानिकारक रेडिएशन को फोन की sar value के जरिये ही आंका जा सकता हैं। हर मोबाइल की सार वैल्यू अलग होती हैं।ऐसे में आप जानते हैं कि जिस स्मार्टफोन का आप यूज लें रहे हैं वो आपको कितना नुक्सान पहुँचा रहा हैं।

किस तरीके से आप अपने फोन की sar value को चेक कर सकते हैं। और समझ सकते हैं कि फोन की सार वैल्यू कितनी ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं।

यह भी पढ़े⇒ साइटिका (Sciatica)का ऑपरेशन करवाने करवाने की सोच रहे है तो यह जरुर पढ़े ⇐

रेडिएशन से बचने के उपाय – जब मोबाइल से बात हो रही हैं तो कोशिश कीजिए कि सीधे कान पर फोन लगाकर लगातार बात नहीं करें और उसके बजाय फोन के स्पीकर या फिर ईयर फोन के जरिये बात करें यही नहीं कॉल बंद होने के बाद इयरफोन को तुरंत कान से हटा लें

इसके अलावा शरीर के किसे भी हिस्से पर मोबाइल फोन रखना भी काफी खतरनाक हो सकता हैं। ऐसे में मोबाइल को ज्यादा से ज्यादा दूरी रखने की कोशिश करें। और लोग यह सोचते हैं

कि अगर मोबाइल बंद हैं तो मोबाइल में रेडिएशन नहीं हो रहा हैं। जबकि ऐसा नहीं हैं आप उस समय भी रेडिएशन की चपेट में आ सकते हैं भले ही वो पूरी तरह से बंद ही क्यू नहीं हो, खतरनाक रेडिएशन से बचने के लिए मोबाइल को तकिये के नीचे नहीं रखना चाहिए।

और बहुत जरूरी हो तो ही mobile से बात करें, और कोशिश करें कि मैसेज के जरिये ही बातचीत हो जाएँ तो बेहतर हैं। और रेडिएशन का खतरा कम करने के लिए मोबाइल के कवर के अंदर देशी गाय के गोबर का सूखा हुआ टुकड़ा रख लें इससे भी रेडिएशन का खतरा कम होता हैं।

⇒ कही आप शाम को आम तो नही खाते ! आम खाने का सही समय और फायदे – Right Time To Eat Mango ⇐ click करे

जानिए लू (hot wind) लगने के लक्षण और घरेलू और रामबाण उपचार के बारे में।

0
hot wind

लू (hot wind) से बचने के घरेलू उपाय गर्मियों के दिनों में अपने देश के कई शहरों में तापमान इतना ज्यादा हो जाता हैं कि घरों से बाहर निकलना भी मुश्किल हो जाता हैं।

इन दिनों दोपहर के समय बाहर बहुत तेज गर्म हवाएं चलती है। इन गर्म हवाओं को ही लू (heat stroke) कहते है। मजबूत इम्युनिटी वाले लोग इन गर्म हवाओं को सहन कर लेते हैं,लेकिन अधिकांश लोग इन हवाओं को सहन नहीं कर पाते हैं।

और इनके संपर्क में आते ही बीमार पड़ जाते हैं। अपने देश में हर साल काफी बड़ी तादात में लोग लू की चपेट में आ जाते हैं।वैसे तो लोग लू तेज गर्मी और धूप से बचने के लिए कई तरह से सतर्क रहते हैं,और इनसे बचने का पूरा प्रयास भी करते हैं।

लेकिन इतनी सावधानी बरतने के बावजूद भी लू लग जाएं या फिर शरीर में गर्मी अधिक बढ़ जाने पर बीमार महसूस करें,तो यह उपाय जरुर आजमाने चाहिए। कोशिश करें की आपका हाथ,मुहँ और सिर पूरी तरह से ढका हो, सूती कपड़ा ही पहने निकलते समय छाता साथ लें जाना न भूलें।

घर में भी कमरे के तापमान को कम रखें और घरों में हवा आती-जाती रहे इसका ख्याल रखें। पानी खूब पीएं, फलों का जूस नींबू पानी का इस्तेमाल करें हरा धनिया भी लूँ से बचाने में फायदेमंद हैं।

अगर लू लग जाएँ तो कच्चे आम का पन्ना बनाकर पीएं यह शरीर को ठंडा रखता हैं। इसके छिलके को हाथ-पैर और चेहरे पर लगाने से बदन का तापमान घटता हैं और जल्द राहत मिलती हैं। गर्मी में छाछ का इस्तेमाल ज्यादा करना चाहिए।

यह शरीर में पानी की कमी को दूर करेगी दही को अपने भोजन में शामिल करें। कोशिश करें कि बाहर निकलते समय ठंडी चीजों का सेवन करके निकले।जैसे ठंडा दही या ठंडी लस्सी और बेल का शरबत भी काफी फायदेमंद हैं

इसमें विटामिन और खनिज की कमी को भी पूरा करने की शक्ति हैं और शरीर में शक्ति भी पहुचायेगा। इमली और पुदीने का पानी भी लू से बचाने का बेहतरीन उपाय हैं।

लू लगना क्या हैं? लू लगना आतप ज्वर उष्मा-मूर्छा (हिट स्ट्रोक या सन स्ट्रोक) शरीर की वह रुग्ण अवस्था हैं जिसमें गर्मी के कारण शरीर का तापमान 40.0 डिग्री फारेनहाइट) के पास पहुंच जाता हैं।

और मन में उलझन की स्थिति रहती हैं। इसके अन्य लक्षण ये हैं- लाल, शुष्क त्वचा, सिरदर्द, चक्कर आना आदि। लू क्यों चलती हैं? गर्मियों के मौसम में शुष्क और गर्म हवाओं को लू कहते हैं।

मई या जून के मौसम में जब हवा उत्तर-पूर्व तथा पश्चिम से पूरब दिशा से आती हैं तो वो काफी गर्म होती है। यह इतनी खतरनाक होती हैं कि इससे लोगों की जान भी जा सकती हैं, लूँ लगने का मुख्य कारण हैं शरीर पानी और नमक की कमी।

hot wind

लू लगने के लक्षण और इससे क्या खतरा हें – बाहरी तापमान और गर्म हवा की वजह से शरीर ठंडा नहीं हो पाता और शरीर का तापमान 106 डिग्री फेरनहाइट या इससे भी ज्यादा हो जाता हैं।

सबसे पहले लू लगने पर तेज बुखार और उल्टी बेहोशी चक्कर आना मांसपेशियों में ऐठन होना शारीरिक रूप से कमजोर लोग,छोटे बच्चों और ह्रदय रोगी को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए।

अगर लू लगने के कोई भी लक्षण सामने आएँ तो तुरंत लूँ को निकालने के लिए घरेलू उपाय जरुर करें। अगर घरेलू उपाय से फायदा नहीं मिले तो डॉक्टर की सलाह जरुर लें। क्योंकि इससे मृत्यु या स्थायी विकलांगता भी हो सकती हैं।

यह भी पढ़े ⇒लू से(Sunstroke)बचने के लिए करें ये 5 बेहतरीन घरेलू उपचार⇐

लू उतारने के घरेलू उपाय – लू उतारने के लिए एक कांसे का बर्तन लें उसमें कम से कम एक कप छाछ डाले और पुदीने के पत्ते डाले इमली के बीज भी डाले और गेहूँ के धान के डनटल भी डाले और थोडे चने के पेड़ के पत्ते सूखे हुए ये सब डाल ले।

उस कांसे के बर्तन में जैसे कांसे की थाली से आसानी से लू उतर जाएगी। और सारी चीजे उस कांसी की थाली में डाल लें। अब जिस आदमी, बच्चे या औरत को लू लगी हो उसे लेटा दें।

लेटा कर सारे शरीर के टच करते हुए उस कांसी की थाली को सिर से पेरो तक लें जाएँ।और सात बार लू उतारे ऐसा दिन में तीन बार करने से लूँ निकल जाती हैं।और जिसे लू लगी हो उसे प्याज का रस भी पिलाएं इससे भी लू निकलती हैं।

लू लगने पर रोगी को क्या देना चाहिए – सबसे पहले मरीज को ठंडी और छायादार जगह में बिठाएं, कपड़े ढीले कर दें। पानी पिलाएं और ठंडा कपड़ा उसके शरीर पर रखें।

शरीर के तापमान को कम करने की कोशिश करें। लू लगने पर ऐसा करना सबसे जरूरी हैं। लगातार तरल पदार्थ देकर उसके शरीर में पानी की कमी न होने दें।

लू लगने पर क्या खाना चाहिए- आम पना, शिकंजी खस-खस का शरबत दही का घोल बहुत ही फायदेमंद रहता हैं। तरबूज और खरबूजा खाएँ पूरे दिन में हो सके जितना पानी पीएं और कच्चा प्याज खाएँ। इन सब चीजों से लू निकलती हैं।

⇒ इस विडियो को देखने के बाद कोई भी व्यक्ति नही कहेगा की आयुर्वेदिक दवा असर नही करती।⇐ click करे

कोरोना महामारी (Corona epidemic) का जाल हैं एक महाषड्यंत्र

0
Corona epidemic

कोरोना महामारी (Corona epidemic) का जाल हैं एक महाषड्यंत्र कोरोना का हाहाकार पूरी दुनिया में छाया हुआ हैं,अमेरिका रूस और चीन के मीडिया और नेताओं की बात करें

तो वो ये मान रहे हैं कि कोरोना वायरस अपने आप पैदा नहीं हुआ बल्कि इसे साजिश के तहत पैदा किया गया हैं। चीन,रूस और ईरान इसके लिए सीधे अमेरिका को निशाने पर ले रहे हैं, क्या इसके पीछे सच में चीन की कोई साजिश हैं

कोरोना से जुड़ा सच छिपा रहा हैं चीन,जब से वैश्र्विक मीडिया ने कोरोना वायरस के बारे में खबरें छापनी शुरू की हैं तभी से इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि चीन की सरकार ने इस बिमारी से जुड़े कई आधिकारिक आंकड़ों को छिपाने की कोशिश की हैं।

एक तथ्य ये हैं कि चीनी सरकार ने वहिसलब्लोअर्स और डॉक्टरों को डराने की कोशिश की, ताकि सही जानकारी सामने न आ सकें। दरअसल इन लोगों ने इस महामारी के बारे में लोगों को पहले ही सचेत करने की कोशिश की थी।

लेकिन चीनी (China) सरकार ने फिर भी किसी को मुहँ नहीं खोलने दिया। हालांकि चीनी की सरकार (Government) इस तरह की बातों को पूरी तरह नकार चुकी हैं। कोरोना की भविष्यवाणी भी की जा चुकी हैं।

सोशल मीडिया पर यह दावा किया जा रहा हैं कि इस महामारी की भविष्यवाणी पहले की जा चुकी हैं। जिसमें कहा गया हैं कि इस जैविक हथियार में इतनी ताकत थी कि वो पूरी मानव जाति का ही खात्मा कर सकता था।

लेकिन इस दावों में कितनी सच्चाई हैं इसकी कोई पुष्टि नहीं कर रहा हैं। सोशल मीडिया पर जिन बातों का जिक्र किया गया हैं,उसे चीन के शहर वुहान से जोड़कर देखा जा रहा हैं। लेकिन यह पूरी असलियत नहीं हैं।

पिछले कुछ दिनों में यह हर जगह सुनने को मिला कि कोरोना चीन के जैविक हथियार बनाने की कोशिश का नतीजा हैं। कोरोना की उत्पति को लेकर जहाँ एक तरफ चीन को सवालों के घेरे में खड़ा करने की कोशिश हो रही हैं।

Corona epidemic

और इसे चीन का जैविक हथियार बताया जा रहा हैं,वहीं एक हालिया शोध में दावा किया गया हैं कि यह वायरस प्राकृतिक हैं। किताब के पहले एडिशन में बताया गया हैं कि ये वायरस रुसी शहर गोर्की से फैला हैं। किताब के अनुसार रूस का बनाया गया सबसे खतरनाक जैविक हथियार हैं।

चारों और तरह-तरह की रिसर्च चल रही हैं, लेकिन फिलवक्त इस महामारी का कोई इलाज नहीं, इधर राष्ट्रीय स्तर पर जब खेल जैसे सभी खेल स्थागित हैं, कतिपय मरीज डॉक्टर, नर्स,वार्ड बॉय और पुलिस के साथ छुपम-छुपाई खेलते हुए भावुकता में सरोबार हुए जाते हैं,

वे सोच रहे हैं कि इस कदीमी लुकाछिपी के जरिये वे इस बार महाकाल को भी धता बता देंगें,हंसते-हंसाते आनंद से गुजर जाना हमारे समय का महज मुहावरा या अस्सी के दशक की फ़िल्मी कहानी नहीं, असल जिन्दगी का संप्रति सर्वमान्य फसलफा हैं,

निठल्लेपन से भरे वक्त में घर के छज्जों पर तैनात तमाम टीनएजर्स के हाथ स्मार्टफोन के स्क्रीन के ईद-गिर्द अकुला रहे हैं कि कुछ अनहोनी दिखे, तो उसे कैप्चर कर व्हाट्सएप ग्रुप में चस्पा कर दें।उनके भीतर का शरलोक होम्स आतिशी शीशी लिए जर्रे-जर्रे पर गहरी नजर रखे हुए हैं।

37 वर्षीय अमेरिकी पोंप सिंगर केरी हिल्सन ने अपने ट्विटर हैंडल से एक और अफवाह को जन्म दे दिया हैं। उन्होंने कोविड- 19 को एक षड्यंत्र बताते हुए अपने ट्वीटमें दावा किया कि 5जी सेवा कोरोनावायरस के प्रकोप से जुड़ी हैं।

केरी ने स्क्रिनशोर्ट और वीडियो के साथ ट्वीट्स की एक के बाद एक कई तस्वीरें साझा की जिसमे यह कहा गया था कि 5जी सेलुलर नेटवर्क सेवा सीधे तौर पर सिओवीआईडी-19 के प्रसार से जुड़ी हुई हैं।

जब कोरोनावायरस फैलना शुरू हो गया तो लोगों ने इसकी तुलना सार्स (Sars) के प्रकोप से कर दी गई। Sidrap रिपोर्ट के अनुसार कोरोना वायरस के लिए मृत्यु दर 23%हैं जबकि sars के लिए यह 9.6% था। हालांकि इस बात पर भी संदेह किया जा रहा हैं कि क्या इससे जुड़े सही आंकड़े छिपाएं जा रहे हैं।

Corona epidemic

एक और कारण भी हैं कोरोना महामारी का 

जिस तरह कोरोनावायरस महामारी ने गति पकड़ी हैं उसी तरह इसके शुरू होने और फैलने का कारण बताने वाले तमाम किससे भी शुरू हो गये हैं। इन कहानियों में एक सिद्धांत ऐसा भी हैं

जिसने 5जी तकनीकी के हालिया आगमन को ही दोषी मान लिया हैं। 5जी के खतरों के बारे में चेतावनी देने वाले समूहों की संख्या बढ़ रही हैं और कई देश इसके गवाह बन रहे हैं। यूके, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में एक्टिविस्ट यह मानते हैं कि 5जी ही इस महामारी की असल वजह हैं

और विषाणु के प्रसार पर लगाम लगाने के लिए 5जी नेटवर्क में खलल डालना बेहद जरूरी हैं। वो चेतावनी देने वाले इन समूहों के चरम छोर पर वो लोग हैं जो कोविड-19 को एक छल मानते हैं। उनका कहना हैं कि एक अधिक नुक्सान वाली कहानी हैं,

जिसमें 5जी एक अहम हिस्सा हैं। लोग षड्यंत्रकारी सिद्धांतो पर यकीन क्यों करते हैं और इनकी बढ़ती लोकप्रियता का राज क्या हैं? इन यकीन की जड़ो में मिलता हैं कि ऐसे लोगों का मौजूदा सरकारों और स्वास्थ्य संगठनों के प्रति अविश्वास का भाव हैं।

इसके अलावा, संकट के समय लोग खासतौर पर इन वैकल्पिक सिद्धांतों को तैयार करते हैं। साजिश का सिद्धांत रचने वाले लोग खुद अपनी पहचान सच की खोज करने वाले के तौर पर करते हैं।

वे अक्सर किसी व्यापक जन आन्दोलन का हिस्सा होते हैं,जिससे यह माना जाता हैं कि वे स्वतंत्र ख्यालों वाले हैं और उनमें सच को कहने और जानने के लिए पर्याप्त साहस हैं। वे साहसी गुप्तचरों की तरह काम करते हैं।

वे शक्तिशाली समूहों का खुलासा करते हैं जो गोपनीयता में दुर्भावनापूर्ण नतीजों को हासिल करने के लिए संचालित हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे ”इन्फोड़ीमिक” यानी सूचनाओं की महामारी का नाम दिया हैं।

सोशल मीडिया कंपनियों पर दुष्प्रचार के इस प्रवाह को रोकने का दबाव बन रहा हैं। इसके बावजूद सत्यशोधक समूह सोशल मीडिया यानी फेसबुक,ट्विटर और वोट्सऐप्प के ह्स्तक्षेपों को ताकतवर संस्थाओं व अभिजात वर्ग द्वारा ‘असल सच’ छुपाने के षड्यंत्र के बतौर देखती हैं। 5जी के खंभों पर हमले जैसी घटनाएं,

एक ऐसे बैरोमीटर की तरह काम करती हैं जिससे हमें नेतृत्व और विशेषज्ञों के प्रति लोगों के अविश्वास की थाह मिलती हैं। असे में सरकारों और मीडिया के लिए यह चुनौती होगी कि वे लोगों का विश्वास फिर से पाने के लिए पारदर्शी तरीके से खुलेपन की मिसाल पेश न करें कि वैकल्पिक सत्यों को लेकर उनकी भूख को और बढाएं।

जो इस महामारी के षड्यंत्र के खेल को समझ चुके हैं,वे तत्काल अपने सारे अधूरे कार्य पूरे कर ले,अपने आवागमन को 6 माह या 1 वर्ष तक या इससे भी अधिक समय तक पूरी तरह से सीमित कर दे या बाधित कर लें,राशन कार्ड, गैस कॉपी का बहिष्कार करें,

यह भी पड़े⇒ आखिर क्या है ‘कोरोना वायरस'(covid-19) का काला सच ⇐

फ़ूड की सप्लाई शहरों की तरफ जाने से रोके, अपना-अपना आधार कार्ड डिएक्टिवेट करवाएं। तथा अब जन्म लेने वाले बच्चों का आधार कार्ड से लेकर कोई भी डिजिटल आई डी न बनवाये उससे पहले बैंक से पैसा निकालकर बैंक अकाउंट व मोबाइल नम्बर बंद कर दें,अपने घरों में अनाज का भंडारण स्वयं करें और जरूरत से ज्यादा करें पर बेचे नही।

तथा साथ ही अपने खेतों में साग सब्जी मशाला, अनाज दाल आदि का उत्पादन करें,और बीज के लिए अलग से बचाकर रखें बाजारों से नमक खरीद करके रख सकते हैं।

रुपयों को खर्च करके दैनिक एवं लम्बे समय तक काम आने वाली चीजों को खरीद करके रख सकते हैं,कुछ इमरजेंसी दवाएँ भी आपने घरों में रखें, और कुछ चूर्ण हैं जिन्हें आपको बनाना पड़ सकता हैं।

जिसे आपको हम बताएंगे साथ ही अपने घरों में लाठी,डंडे,फावड़ा,गैती,बांका,भाला, बरछी, कुल्हाड़ी, आरा आदि जरुर रखें, और अपने घरों के सामने दीवाल एवं दरवाजे पर यह लिखकर पोस्टर अवश्य चिपकाए कि हम लडकर मर जाएंगे पर वैक्सीन नहीं लगवाएंगे और न ही डिजिटल गुलामी को स्वीकार करेंगे।

⇒ भोजन और प्राण शक्ति का रहस्य जिसे जानने के बाद आप कभी बीमार नही होंगे (प्राण शक्ति Part-2) ⇐ click करें

फेफड़ों का संक्रमण (lung infection) से बचने के घरेलू उपाय

0

फेफड़ों के संक्रमण (lung infection) से बचने के घरेलू उपाय सीने के डिहाइड्रेशन (dehydration) को रोकने के लिए और पतले बलगम को खांसने में आसान बनाने के लिए बहुत ज्यादा तरल पदार्थ पीएं

और आप किसी प्रकार का नशा (dhumrpaaan) करते हैं, तो तुरंत छोड़ दें, खांसी की दवाओं पर अपने पैसे बर्बाद मत करो। इसके बहुत कम सबूत हैं की वे काम करेंगे।और किसी भी मामले में खांसी आपके फेफड़ों से बलगम (phlegum) को हटाकर फेफड़ों को संक्रमण को अधिक तेजी से साफ़ करने में मदद करता हैं।

यदि आपको खांसी हैं और खांसी की वजह से गले में खराश हैं,तो आप अपनी खांसी को शहद और नींबू के गर्म पेय से ठीक कर सकते हैं,क्योंकि ब्रोंकाइटिस आमतौर पर वायरस के कारण होता हैं,

एंटीबायोटिक (antibiotics) के सेवन से शायद ही आपके सुधार में मदद मिलेगी, ब्रोंकाइटिस के लिए अनावश्यक रूप से एंटीबायोटिक का सेवन एंटीबायोटिक प्रतिरोधक (antibiotics resistance) बनकर हानि पहंचा सकता हैं।

निमोनिया हैं तो आप घर पर एंटीबायोटिक टैबलेट का सेवन कर सकते है। यदि निमोनिया अधिक गंभीर हैं तो एंटीबायोटिक अस्पताल में नसों के द्वारा दी जाएगी।वैसे तो सीने का संक्रमण अन्य संक्रमण जैसे फ्लू की तरह संक्रामक नहीं होता हैं,

आप इसे खासने या छिकने के द्वारा दूसरों में फैला सकते हैं। और अगर आप धम्रपान करते हैं तो सीने के संक्रमण होने का खतरा अत्यअधिक रहता हैं। उदाहरण के लिए आपकी उम्र 65 साल हैं तो आपको वैकसीनेशन की सलाह दे सकते हैं।

सांस लेने में दिक्कत क्यों होती हैं? अधिकाँश मामलों में ऑक्सीजन की कमी से सांस लेने में परेशानी होती हैं, लेकिन अन्य मामलो में यह गंभीर बिमारी का संकेत हो सकता हैं। हार्ट संबंधी समस्या की शुरुआत भी सांस की समस्या से होती हैं

बैक्टीरियल और वायरल इंफेक्शन के कारण भी सांस लेने में समस्या हो सकती हैं जिन लोगों को अस्थमा की समस्या हैं, इन्हें इसका सबसे ज्यादा खतरा रहता है। श्वास नली क्षतिग्रस्त होने से भी सांस लेने में दिक्कत होती हैं।

lung infection

फेफड़ों पर वायरस का असर कैसे पड़ता हैं? कोरोना के रूप में वायरल लोड ज्यादा हैं। यह कम समय में संक्रमितों के फेफड़ों के बड़े हिस्से को प्रभावित कर रही हैं यही कारण हैं कि रोगी सही भी हो जाता हैं,

लेकिन उसको सांस लेने में दिक्कत बनी रहती हैं। कुछ लोगों को आक्सीजन में ही रखना पड़ रहा हैं, यह स्थिति मरीजों के ही रोग प्रतिरोधक क्षमता और वायरस के हमले के ऊपर निर्भर करता हैं।आमतौर पर लोग बुखार आने पर पैरासिटामोल या अन्य दवाएँ लेते हैं।

सर्दी और जुखाम की आशंका पर एंटीबायोटिक का सेवन करते हैं, इस दौरान संक्रमण तेजी से फेफड़े पर असर करता हैं। फेफड़े के अंदर एल्वियोली को प्रभावित कर देता हैं। एल्वियोली के माध्यम से ऑक्सीजन शरीर के अन्य हिस्सों तक पहुंचती हैं। यह अत्यधिक सूक्ष्म रहती हैं,

फेफड़े की ब्रांकल ट्यूब होते हैं,जिनसे विंड पाइप के माध्यम से ऑक्सीजन फेफड़े तक पहुंचती हैं। कोरोना वायरस ब्रांकल ट्यूब के साथ ही एल्वियोली के रास्ते में रुकावट डाल रहा हैं। इसमें ऑक्सीजन अंदर नहीं जा पाती हैं। जबकि कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर तेजी से बढ़ता जाता हैं।

कार्बन डाईऑक्साइड को निकालने के लिए पहले ऑक्सीजन को कम करना पड़ता हैं। इसमें रोगी के ऑक्सीजन के स्तर की मोनीटडंक्षरग की जाती हैं। कार्बन डाईऑक्साइड 35 से 40 फीसदी हैं तो कोई ख़ास खतरे की बात नहीं रहती हैं।

ऑक्सीजन लेने और कार्बन डाईऑक्साइड छोड़ने का एक ही मार्ग रहता हैं इससे समस्या गंभीर हो जाती हैं। पर इस पर जल्द ही शोध किया जाएगा। कार्बन डाईऑक्साइड की अधिक मात्रा वाले रोगियों की रिपोर्ट तैयार की जा रही हैं।

सीने के संक्रमण के कारण – सांस नली के जाम होने या फेफड़ों में छोटी-मोटी परेशानी होने पर सांसें छोटी आने लगती हैं यदि आपको यह समस्या लम्बे समय से हैं तो यह दूसरी बीमारी का लक्षण हो सकता हैं,

जैसे अस्थमा, क्रोनिक, ऑब्सट्रक्टिव, पल्मोनरी, डिजीज यानी सीओपीडी और ब्रोंकाइटिस, निमोनिया पर निमोनिया ब्रोंकाइटिस के जैसा नहीं हैं, यह अक्सर बैक्टीरिया के कारण होता हैं और इलाज के लिए एंटीबायोटिक की जरूरत होती हैं।

यदि आपको हल्का निमोनिया हैं तो आप घर पर एंटीबायोटिक टैबलेट का सेवन कर सकते हैं, यदि निमोनिया अधिक गंभीर हैं तो एंटीबायोटिक अस्पताल में नसों के द्वारा दी जाएगी। हालांकि सीने का संक्रमण अन्य संक्रमण जैसे फ्लू की तरह संक्रामक नहीं होता हैं

आप इसे खासने या छींकने के द्वारा दूसरों में फैला सकते हैं।इसलिए यदि आपको सीने में संक्रामण हैं तो खांसने या छींकते समय अपने मुहँ को ढकना और नियमित हाथ धोना बहुत जरूरी हैं। इस्तेमाल किए हुए टिशू को तुरंत फेंक दें।

और अगर आप धम्रपान करते हैं तो सीने के संक्रमण से बचने के लिए जो आप सबसे अच्छी चीज कर सकते हैं वो हैं धुम्रपान छोड़ना। धुम्रपान आपके फेफड़ों को खराब कर देता है,और संक्रमण के विरोध में आपकी सुरक्षा को कमजोर कर देता हैं।

lung infection

यह भी पढ़े⇒  फेफड़ों का कैंसर(lung cancer) के लक्षण बचाव व उपचार⇐

सांस लेने में दिक्कत का उपचार – हार्ट या फेफड़ों की समस्याओं के कारण सांस लेने में दिक्कत होती हैं। इसके अलावा एलर्जी, लो ब्लड प्रेशर, एनीमिया, दिल बढ़ना कोरोनरी धमनी रोग भी इसके प्रमुख कारण होते हैं।

इन बीमारियों का इलाज करके सांस की दिक्कत से बचा जा सकता हैं। होम्योपैथी में इसका इलाज कारगर इलाज बताया गया हैं। इसके अलावा फेफेड़ों को मजबूत बनाने वाले योगासन करके इस समस्या से बचा जा सकता हैं।

जो लोग अत्यधिक शराब या धुम्रपान का सेवन करते हैं, उन्हें खतरा अधिक रहता हैं, इसलिए इन बुरी चीजों से दूर रहे। प्रदूषण से बचे, अपना वजन कंट्रोल रखे मोटापे के कारण शरीर को हर काम में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती हैं

और सांस फूलती हैं।अपनी जीवनशैली बदलें,फैट्स वाले खाद्य पदार्थो के बजाए फल और सब्जियों का अधिक सेवन करें। इसके अलावा नट्स, बीज और मछली का सेवन फेफड़ों को मजबूती देता हैं।

इनमें एंटीऑक्सिडेन्ट्स और ओमेगो 3 फैटी एसिड होता हैं,जो फेफड़ों को हर तरह के संक्रमण से बचाता हैं। जिन चीजों को खाने से एलर्जी हैं उन चीजों से दूर रहें। और स्वस्थ रहें।

⇒धुम्रपान की वजह से फेफड़ो में जमी गंदगी को 3 दिन में साफ़ करे | Lungs Detox Drink.⇐ click करे

आखिर क्या है वायरस (Virus)

0
Virus

वायरस Virus क्या हैं विषाणु (virus) अकोशिकीय अतिसूक्ष्म जीव हैं जो केवल जीवित कोशिका में ही वंश वृद्धि कर सकते हैं। ये नाभिकीय अम्ल और प्रोटीन से मिलकर गठित होते हैं,

शरीर के बाहर तो यह मृत-सम्मान होते हैं। परन्तु शरीर के अंदर जीवित हो जाते हैं इन्हें क्रिस्टल के रूप में इकट्ठा किया जा सकता हैं। एक विषाणु बिना किसी सजीव माध्यम के पुनरुत्पादन नहीं कर सकता हैं।

यह सैंकड़ों वर्षो तक सुसुप्तावस्था में रह सकता हैं और जब भी एक जीवित माध्यम या धारक के संपर्क में आता हैं तो उस जीव की कोशिका को भेद कर आच्छादित कर देता हैं और जीव बीमार हो जाता हैं। एक बार जब विषाणु जीवित कोशिका में प्रवेश कर जाता हैं।

वह कोशिका के मूल आरएनए एवं डीएनए की जेनेटिक संरचना को अपनी जेनेटिक सूचना से बदल देता हैं और संक्रमित कोशिका अपने जैसे संक्रमित कोशिकाओं का पुनुरुत्पादन शुरू कर देती हैं।

वायरस कोशिका के बाहर तो मरे हुए होते हैं,लेकिन जब यह कोशिका में प्रवेश करते हैं तो इनका जीवन चक्र प्रारम्भ होने लगता हैं। प्रकृति के अनुसार विषाणु तीन प्रकार के होते हैं। (1) पादप विषाणु (plant virus) (2) जन्तु विषाणु (animal virus) (3) जीवाणुभोजी (Bacteriophage)।

विषाणु, लाभप्रद एवं हानिकारक दोनों प्रकार के होते हैं। जीवाणुभोजी एक लाभप्रद विषाणु हैं, यह हैजा,पेचिश, टाइफाइड आदि रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं को नष्ट कर मानव की रोगों से रक्षा करता हैं।

कुछ विषाणु पौधे या जन्तुओं में रोग उत्पन्न करते हैं। एवं हानिप्रद होते हैं। एचआईवी, इन्फ्लूएंजा वाइरस,पोलियो वाइरस रोग उत्पन्न करने वाले प्रमुख विषाणु हैं। सम्पर्क द्वारा,वायु द्वारा, भोजन एवं जल द्वारा तथा कीटों द्वारा विषाणुओं का संरचण होता हैं परन्तु विशिष्ट विधियों द्वारा संरचण करते हैं।

Virus

वायरस क्या हैं – वायरस मतलब विषाणु और विषाणु मतलब विष और (विष) मतलब पॉयजन तो हमें पॉयजन से बचने के लिए ज्यादा से ज्यादा क्या करना हैं हमें स्वस्थ रहना हैं,हमारी इम्युनिटी को स्ट्रोंग करना हैं

हमारी इम्युनिटी स्ट्रोंग रहेगी तो हम स्ट्रोंग रहेंगे और पूरा वल्ड भी स्वस्थ रहेगा। तो अब हमें जानना हैं की वायरस क्या होते हैं (वायरस) यानी हिंदी में कहते हैं विषाणु आपके आस-पास की हवा में छिकने,खासने या सांस लेने मात्र से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं

यह कोरोना वायरस अन्य वायरस की तुलना में तेजी से शरीर के माध्यम से यात्रा कर सकता हैं चीन के डेटा में पाया गया की लक्षण शुरू होने के 1 दिन बाद ही covid 19 वाले लोगों के नाक और गले में वायरस का संक्रमण मिला हैं। तो सबसे जरूरी हैं हमारे शरीर का ध्यान रखना हमारी इम्युनिटी को इट्रोंग रखना।

वायरस एक नहीं अनेक हैं अनगनित हैं पर खौफ अभी कोरोना का ही हैं लोगों पर वायरस अटैक करने से पहले तो खौफ से ही मर रहे हैं। इन वायरस में से एक वायरस और हैं (हंता) सीडीसी की रिपोर्ट के मुताबिक़ हंता वायरस चूहों से फैलता हैं।

Virus

अगर कोई इंसान चूहों के मल- मूत्र या लार को छूने के बाद अपने चेहरे पर हाथ लगाता हैं तो हंता संक्रमित होने की आशंका बढ़ जाती हैं। लेकिन आमतौर पर हंता वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं जाता हैं।

हंता संक्रमण का पता लगने में एक से आठ हफ्तों का वक्त लग सकता हैं। अगर कोई व्यक्ति की हालत बिगड़ने पर फेफड़ों में पानी भरने और सांस लेने में तकलीफ भी हो सकती हैं।

हंता वायरस के लक्षण- हंता वायरस के लक्षण को आप आसानी से पहचान सकते हैं रिसर्च के अनुसार जब कोई इंसान में हंता वायरस से संक्रमित होने पर उसे 101 डिग्री के ऊपर बुखार होता हैं,

उसकी मांसपेशियों में दर्द रहता हैं और उसे सिर दर्द भी रहता हैं। इसके साथ-साथ हंता वायरस से संक्रमित व्यक्ति को मितली,उल्टी और पेट दर्द की समस्या भी होने लगती हैं साथ ही साथ त्वचा पर लाल दाने भी उभरने लगते हैं।

जीवाणु और बैक्टीरिया में क्या फर्क हैं – जीवाणु एक एककोशिकीय जीव हैं। इसका आकार कुछ मिलिमीटर तक ही होता हैं, इनकी आकृति गोल या मुक्त- चक्राकार से लेकर छड आदि आकार की हो सकती हैं ये अकेंद्रिक,कोशिका भित्तियुक्त, एककोशिकीय सरल जीव हैं

जो प्राय: सर्वत्र पाए जाते हैं। ये पृथ्वी पर मिटटी में,अम्लीय गर्म जल-धाराओं में नाभिकीय पदार्थों में जल में,भू पपड़ी में,यहाँ तक की कार्बनिक पदार्थो में तथा पौधों में और जन्तुओं के शरीर के भीतर भी पाए जाते हैं। जीवाणुओं का अध्ययन बैक्टीरियालोजी के अंतर्गत किया जाता हैं,

जो की सूक्ष्म जैविकी की ही एक शाखा हैं। मानव शरीर में जितनी भी मानव कोशिकाएं हैं,उसकी लगभग 10 गुणा संख्या तो जिवाणुकोष की ही हैं। इनमें से अधिकाँश जीवाणु त्वचा तथा आहार नाल में पाएं जाते हैं।

हानिकारक जीवाणु इम्यून तन्त्र के रक्षक प्रभाव के कारण शरीर को नुकसान नहीं पहुँचा पाते। कुछ जीवाणु लाभदायक भी होते हैं। अनेक प्रकार के परजीवी जीवाणु कई रोग उत्पन्न करते हैं, जैसे -हैजा, मियादी, बुखार, निमोनिया, तपेदिक या क्षयरोग,प्लेग इत्यादि सिर्फ क्षय रोग से प्रतिवर्ष लगभग 20 लाख लोग मरते हैं।

जिनमें से अधिकाँश उप-सहारा क्षेत्र के होते हैं। विकसित देशों में जीवाणुओं के संक्रमण का उपचार करने के लिए तथा कृषि कार्यो में प्रतिजैविक दवाओं के प्रति प्रतिरोधक शक्ति विकसित होती जा रही हैं

औद्योगिक क्षेत्र में जीवाणुओं का किण्वन क्रिया द्वारा दही, पनीर, इत्यादि वस्तुओं का निर्माण होता हैं। इनका उपयोग प्रतिजैविकी के क्षेत्र में होता हैं।

यह भी पढ़े ⇒ CORONA Virus के लिए तमाचा है ये जानकारी – सिर्फ 3 दिन में वायरस का खात्मा ⇐

विषाणु विज्ञान क्या होता हैं – विषाणु विज्ञान जिसे प्राय: सूक्ष्मजैविकी या विकृति विज्ञान का भाग माना जाता हैं, जैविक विषाणुओं व विषाणु-सम अभिकर्ताओं के वर्गीकरण, संरचना एवं विकास उनकी प्रजनन हेतु कोशिका दूषण या संक्रमण पद्धति, उनके द्वारा होने वाले रोगों,

उनके पृथक करने व संवर्धन करने की विधियाँ, तथा उनके अंतनिर्हित शक्तियाँ शोध व प्रयोगों में करने के अध्ययन को विषाणु विज्ञान कहते हैं। विषाणुओं के अध्ययन की एक मुख्य प्रेरणा यह तथ्य हैं,की वे कई संक्रामक रोग पैदा करते हैं।

इन रोगों में जुखाम,इन्फ्लुएंजा, रेबीज, खसरा दस्त के कई रूप, हैपेटाइटीस, येलो फीवर, पोलियों, चेचक कोरोना वायरस तथा एड्स तक आते हैं। कई विषाणु, जिन्हें ओंकोवायरस कहते हैं। कई तरह के कैंसर में भी योगदान देते हैं।

कई उप-विषाणु कण भी रोग का निमित्त हैं एक उपग्रह विषाणु। विषाणु जिस शैली में रोग करते हैं उसका अध्ययन विषाणवीय रोगजनक या वायरल पैथोजैनेसिस कहलाता हैं। जिस श्रेणी तक कोई विषाणु रोग करता हैं,उसे वायुरुलेंस कहते हैं।

⇒ बीमारी किस प्रकार बनाई जाती है और क्या है बीमारियों का सच ? ⇐ click करे 

औषधीय गुणों से भरपूर है पुदीना (Benefits of peppermint), जानें इसके फायदे

0
Benefits of peppermint

औषधीय गुणों से भरपूर है पुदीना (Benefits of peppermint), जानें इसके फायदे पुदीना एक ऐसा पौधा हैं, जिसका उपयोग भारतीय रसोई घरों में मुख्य उप में चटनी के रूप में किया जाता हैं।पुदीने की भीनी खुशबू और स्वाद से भला कौन परिचित नहीं होगा।

चटनी हो या आम पना, रायता हो या पुलाव हर किसी के साथ मिक्स होकर यह अनोखा स्वाद देता हैं। भारतीय रसोई में पुदीने का इस्तेमाल कई रूपों में किया जाता हैं। पुदीने में मिंथोल, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइडरेड, विटामिन-ए, सी, डी, ई, कैल्शियम और कुछ मात्रा में फास्फोरस और कुछ मात्रा में विटामिन बी भी होते हैं,

रिबोफ्लेविन, कॉपर, आयरन आदि पाएं जाते हैं। पुदीने की पत्तियाँ एंटीओक्सिडेंट से भरी होती हैं, जो की पेट की मांसपेशियों को आराम देती हैं और पाचन क्रिया तन्त्र को दुरस्त भी रखती हैं।

और इसमें मौजूद मिंथोल आपके नाक के बंद द्वार खोल देगा। पुदीने के जूस में पुदीने की पत्तियों को कुचल कर डालने से नाक से सांस लेने में आसानी होती हैं। पुदीने में तेज आने वाली खुशबू और एंटीऑक्सिडेंट दोनों ही मिल कर आपको तनाव से निजात दिलाकर रिलैक्स कर देंगें।

इन हरी पत्तियों में विटामिन सी, डी, ई, कैल्शियम, फास्फोरस और कुछ मात्रा में विटामिन होते हैं। जो कि शरीर की इम्युनिटी को बढ़ाने का काम करते हैं। पुदीने के पत्तों का सेवन कर उल्टी को रोका जा सकता हैं, और पेट की गैस को दूर किया जा सकता हैं।

यह अंदर जमा हुआ कफ होता हैं उसे बाहर निकालता हैं। इसकी तासीर गर्म होने के कारण यह शरीर से पसीना निकालकर बुखार को दूर करता हैं इसमें इतने गुण हैं की किसी कीड़े के काट जाने पर उसके जहर को नष्ट कर सके यह गुण भी होता हैं पुदीने में।

यह पेट से जुड़ी सभी तरह की समस्या को दूर करता हैं आजकल गलत खानपान की वजह से पेट में तरह-तरह की तकलीफे हो जाती हैं। एक चम्मच पुदीने के रस में एक कप गुनगुना पानी और एक चम्मच शहद मिलाकर पिने से पेट के रोगों में आराम मिलता हैं।

जंक फ़ूड खाने या मसालेदार खाना खाने से बहदजमी हो जाती हैं और पेट में दर्द होने लगता हैं। पुदीने को उबालकर इसमें शहद मिलाकर सेवन करने से पेट की समस्या दूर होती हैं।

पुदीने के पत्तों की लुगदी बनाकर इसे हल्का गर्म करके किसी भी तरह के जख्म या किसी कीड़े के काटने वाले स्थान पर रखने से जख्म व कीड़े का काटा ठीक होता हैं,साथ ही उसका दर्द और सूजन भी ठीक हो जाती हैं।

पुदीने का रस काली मिर्च और और काले नमक के साथ चाय की तरह उबालकर पीने से जुखाम खासी और बुखार में राहत मिलती हैं। अगर जोर से सिर दर्द हो और रुकने का नाम ही नहीं हैं

Benefits of peppermint

तो ताज़ी पत्तियों का लेप माथे पर लगाने से आराम मिलता हैं। और हैजा से पीड़ित व्यक्ति को पुदीने के रस के साथ प्याज के रस में नींबू और सेंधा नमक मिलाकर सेवन कराना चाहिए।

हैजा में पुदीने का रस, प्याज का रस, नींबू का रस बराबर-बराबर मात्रा में मिलाकर पिलाने से लाभ होता हैं। उल्टी दस्त, हैजा हो तो आधा कप पुदीने का रस हर दो घंटे से रोगी को पिलाएं।

गर्मी के दिनों में तो अक्सर सड़क के किनारे जूस,आम का पना या दुकानों पर कोल्ड्रिंक आदि पीने के लिए खड़े हो जाते हैं, लेकिन क्या आपने कभी पुदीने का रस पिया हैं।मिंट जूस यानी की पुदीने का जूस गर्मियों में पिने से काफी स्वास्थ्य में लाभ मिलता हैं

पुदीना जूस पीने से शरीर को ठंडक मिलती हैं और गर्मी झट से गायब हो जाती हैं। पुदीने और सौंठ का कवाथ बनाकर पीने से सर्दी के कारण होने वाली बुखार में राहत मिलती हैं।

(skin)केयर की लिए भी पुदीना बहुत फायदेमंद हैं। ताजा -हरा पुदीना पीसकर चहरे पर बीस मिनट तक लगा लें। फिर ठंडे पानी से चेहरा धो लें, यह त्वचा की गर्मी निकाल देता हैं। हरा पुदीना पीसकर उसमें नींबू के रस की दो-तीन बूंदे डालकर चेहरे पर लेप करें।

कुछ देर लगा रहने दें बाद में चेहरा ठंडे पानी से धो लें यह कुछ दिनों तक करें मुंहासे दूर हो जायेंगे तथा चेहरे की कांति खिल उठेगी। अगर आपकी त्वचा ऑयली हैं तो पुदीने का फेशियल आपके लिए सही रहेगा।

Benefits of peppermint

यह भी पढ़े ⇒ गिलोय (अमृता) के अद्भुत फायदे(Benefits of Giloy) ⇐

इसको बनाने के लिए दो बड़े चम्मच दही और एक बड़ा चम्मच ओटमील (जई का दलिया) लेकर गाढ़ा घोल बनाएँ। इसे चेहरे पर 10 मिनट तक लगाएं और चेहरे को धो लें। पुदीने के पत्तो का इस्तेमाल दांतों की देखभाल में भी किया जाता हैं

इसके अलावा इसका प्रयोग मुंहासे और ब्लैकहेड्स को ठीक करने में भी किया जाता हैं। पुदीना शरीर से टोक्सिन और फ्री रैडिकल को निकालने में भी मदद करता हैं। अगर आप इसे डाईट में शामिल करती हैं तो यह जीवाणु और कवक को शरीर से दूर करता हैं।

और गर्मियों के लिए रामबाण तो हैं ही पुदीना। मिनरल्स से भरपूर पुदीना विटामिन-सी का भी अच्छा स्त्रोत हैं। इसकी कई वैरायटी हैं, जिसमें पिपरमिंट और स्पीयरमिंट सबसे ज्यादा उपयोग में लाया जाता हैं।

Benefits of peppermint

इसकी अनेक खूबियां हैं,यह भोजन को पचाने में तो कारगर हैं ही पेट में होने वाले काफी रोगों के उपचार में भी उपयोगी साबित होता है। इसके अधिकतम लाभ के लिए कब,कैसे और कितने पुदीने का इस्तेमाल करना चाहिए।

सेहत संबंधी कोई भी परेशानी हो तो घरेलू नुस्खों के जरिये कई रोगों को ठीक किए जा सकते हैं। पुदीना जिसका महत्व आयुर्वेद में भी बताया गया हैं।

आयुर्वेद में पुदीने को वायुनाशक जड़ी-बूटी के रूप में देखा जाता हैं जो साइन में जलन,मितली आदि में राहत देता हैं। इसके पत्ते को चबाकर खाने से पेट दर्द और आँतों की ऐठन में आराम मिलता हैं।

⇒ एक ही रात में पेट के सारे कीड़े बाहर ⇐ click करे

धागे वाली मिश्री है कई बीमारियों का इलाज (Mishri cures many diseases)

0
Mishri cures many diseases

मिश्री है कई बीमारियों का इलाज (Mishri cures many diseases)
इसे मुख्य रूप से गन्ने और खजूर के रस से तैयार किया जाता हैं, इसका उत्पादन सबसे पहले भारत में ही शुरू हुआ, इसके बाद धीरे-धीरे यह पुरे विश्व में उपयोग की जाने लगी।

इसमें चीनी के मुकाबले कम मिठास होती हैं मिश्री के आकार में बड़े टुकड़े को अंग्रेजी में (rock sugar) के नाम से भी जाना जाता हैं, आपको यह कई रूप और कई आकार में मिल जाएगी। और पूजा के बाद प्रसाद के रूप में मिश्री अपना ख़ास महत्व हैं,

वही कुछ लोग मीठे पकवान या फिर दूध में चीनी की जगह मिश्री का ही इस्तेमाल करते हैं। मिश्री चीज ही ऐसी हैं, जो मुहँ में जाते ही मिठास घोल देती हैं। क्या आप जानते हैं की मिठास से भरी मिश्री को कई गंभीर बीमारियों का अचूक इलाज भी माना गया हैं।

इसमें औषधीय गुण इतने हैं की कई आयुर्वेदिक दवाओं में इसे विशेष प्रभाव की लिए इस्तेमाल किया जाता हैं अब मिश्री के फायदों के बारे में बात करते हैं -शरीर में हिमोग्लोबिन का स्तर कम होने से खून की कमी होती हैं बिना कुछ किए थकान महसूस होती हैं,
कमजोरी का एहसास होता हैं कई लोगों को चक्कर भी आते हैं, तो वही खून की कमी के कारण कुछ लोगों की रंगत चली जाती हैं। तो इस कारण मिश्री का सेवन रक्त में हिमोग्लोबिन का स्तर बढ़ाकर एनीमिया से बचाव करती हैं।
इसके अलावा यह शरीर में रक्त परिसंचरण में भी सुधार करती हैं।और मिश्री में डाइजेस्टिव गुण मौजूद होते है, जिससे खाना जल्दी और आसानी से डाइजेस्ट हो जाता हैं। इसलिए खाना खाने के बाद मिश्री और सौंफ का सेवन जरुर करें,
सौंफ के साथ मिश्री खाने का सबसे पहला लाभ तो यह हैं कि सौंफ का जो हल्का कसैला-सा स्वाद होता हैं मिश्री के साथ इसे खाने से उस स्वाद का अहसास नहीं हो पाता हैं। सौंफ के साथ मिश्री खाने से दूसरा लाभ यह होता हैं कि भोजन करने के पूर्व संतुष्टि हमारे शरीर और मन को प्राप्त होती हैं
इससे मानसिक एकाग्रता बढ़ाने में मदद मिलती हैं। और अगर शरीर में गर्मी हो तो मिश्री खा लें मिश्री खाने से शरीर को ठंडक मिलती हैं,और शरीर की गर्मी से राहत मिल जाती हैं। गर्मी होने पर आप एक गिलास ठंडे पानी में मिश्री के दाने डाल दें,

 

इस पानी में मिश्री को अच्छे से घोले और यह घूल जाएँ तो इस पानी को पी लें। यह पानी पीने से शरीर अंदर से ठंडा हो जाएगा। मिश्री के अंदर फाइबर, विटामिन, खनिज, एमिनो एसिड और कई तरह के पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसका प्रयोग आयुर्वेदिक दवाओं को बनाने में खूब किया जाता हैं।

मुँह के छालों में आराम देती हैं धागे वाली मिश्री – अगर आप के मुहँ में छाले हो गये हो तो छालों की समस्या से राहत पाने के लिए भी आप मिश्री का इस्तेमाल कर सकते हैं, इसके लिए मिश्री और हरी इलाइची को बराबर मात्रा में पीसकर पेस्ट बनाएँ और उसे मुहँ के छालों पर लगाएं, नियमित रूप से इस प्रक्रिया को अपनाने से छालों की समस्या जल्द ही खत्म हो जाती हैं।
इलाइची और धागे वाली मिश्री के फायदे – इलाइची का खाना खाने के बाद सेवन करने से मुहँ की दुर्गन्ध दूर करने के साथ दांतों की कैविटिज की समस्या से भी छुटकारा मिलता हैं। इसके अलावा उल्टी और मितली की परेशानी भी दूर होती हैं। इलाइची के अर्क को रोजाना सेवन करने पर लीवर से जुड़ी बीमारियों (फैटी लीवर का खतरा कम होता हैं।

यह ही पढ़े⇒ 1 गिलास नारियल दूध (coconut milk) से करे रोगों से बचाव⇐

वजन को नियंत्रित करती हैं धागे वाली मिश्री – अगर आप अधिक वजन से परेशान हैं तो मिश्री का उपयोग आप के लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता हैं, मिश्री का सौंफ के साथ पाउडर बनाकर नियमित एक चम्मच लेने से वजन कम होता हैं अगर आप चाहो तो सौंफ की जगह धनिया पाउडर का भी उपयोग कर सकते हैं।
आँखों की रोशनी को बढाती हैं धागे वाली मिश्री – मिश्री औषधीय गुणों में से एक यह भी हैं कि इसे खाने के बाद आँखों के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद मिल सकती हैं मिश्री का सीमित मात्रा में नियमित सेवन करने से आँखों की रोशनी के अलावा मोतियाबिन्द जैसी समस्या में भी सकारात्मक परिणाम प्रदर्शित कर करता हैं।
और आँखों के साथ-साथ मष्तिष्क के लिए भी फायदेमंद हैं मिश्री आयुर्वेद में मिश्री को मानसिक स्वास्थ्य की एक प्राकृतिक औषधि के रूप में उपयोग किया जाता हैं। मिश्री को गर्म दूध के साथ हर रात पीने से याददाश्त मजबूत होती हैं और मानसिक तनाव से भी राहत मिलती हैं।
पाचन का सुधार करती हैं मिश्री – पाचन प्रक्रिया में सुधार के लिए भी मिश्री का उपयोग फायदेमंद माना गया हैं। आयुर्वेद में भी इस बात का वर्णन हैं की खाने के बाद मिश्री को सौंफ के साथ सेवन करने से पाचन क्रिया बेहतर हो सकती हैं,
मिश्री में डाइजेस्टिव गुण मौजूद होते हैं जिससे खाने को पचाने में मदद मिलती हैं इस कारण हम कह सकते हैं यह नुस्खा पाचन प्रक्रिया को सुधारने में भी मदद करता हैं।

 

खासी में तुरंत फायदा करती हैं मिश्री – अगर किसी को खासी हो तो तुरंत आराम देती हैं मिश्री और गले में खराश आदि भी खत्म करती हैं। और खासी ज्यादा परेशान कर रही हो तो मिश्री इसे दूर करने में काफी मदद करती हैं।

धागे वाली मिश्री फायदेमंद होती हैं गर्भवती महिलाओं के लिए – मिश्री का सेवन गर्म दूध के साथ करने से मानसिक स्वास्थ्य अच्छा बना रहता हैं। साथ ही तनाव से मुक्ति मिलती हैं और गर्भवती महिलाओं में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण चिंता, तनाव, और अवसाद की समस्याओं का होना आम हैं इसलिए गर्भवती महिलाओं को इन समस्याओं से राहत मिल सकती हैं।
धागे वाली मिश्री से होता हैं नकसीर में आराम – नाक में से बहते खून को (नकसीर) कहते हैं। जो काफी आम समस्या हैं, मिश्री की तासीर ठंडी होती हैं और यह शरीर को शीतल कर गर्मी के प्रभाव को दूर रखता हैं
नाक से खून आने की समस्या गर्मियों के दिनों में ही देखी जाती हैं, जो शरीर का तापमान बढ़ने के कारण होती हैं। पानी के साथ मिश्री का सेवन इस समस्या से राहत पाने का एक बेहतर विकल्प हैं।
खांसी-ज़ुकाम और गले की खराश के लिए – खांसी-ज़ुकाम और गले में खराश होने पर आप धागे वाली मिश्री का सेवन कर सकते हैं। इसके लिए आप मिश्री के दस और काली मिर्च के पांच दानों को पीसकर पाउडर बना लें। दोनों को मिलाकर रात में सोने से पहले इसका सेवन करें।

⇒ छुआरे वाला दूध पीने के जादुई फायदे जानकर चौक जाएँगे आप – Proven Health Benefits of Dates With Milk.⇐ click करे

लीवर डिटॉक्स (Liver detox) करने के रामबाण उपाय

0
Liver detox

लीवर डिटॉक्स (Liver detox) करने के रामबाण उपाय लिवर शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो शरीर में ब्लड को शुद्ध करने और भोजन को पचाने का कार्य करता है।

अगर लीवर सही तरीके से काम नही करता तो शरीर में कही तरह की बीमारिया हो सकती है लेकिन हमारी कुछ आदतों की वजह से लिवर सही से काम नहीं कर पाता। इन आदतों में तला-भुना खाना, एक्‍सरसाइज न करना, जरूरत से ज्यादा धूम्रपान आदि जैसे बुरी आदते शामिल हैं।

लिवर पर अधिक दबाव पड़ने के कारण यह शरीर से विषाक्त पदार्थों को सही से बाहर नहीं निकाल पाता है। अगर लीवर सही तरीके से काम नही करता है तो लीवर में बहुत सारी बीमारिया देखने को मिलती है

जैसे- फेटी लीवर, सिरोसिस ऑफ लिवर,हेपेटाइटिस, Hepatic यानी लीवर कैंसर भी ओ सकते है। अगर आप को राईट साइड में पेट की तरफ भारीपन सा लगे तो अगर पेट फुला-फुला सा लगे या पेट साफ़ ना रहता हो, खट्टी डकार आना, बदहज़मी बहुत ज्यादा लगे, पेट में जलन होना,

बी.पी की परेशानी, कोलेस्ट्रोल में परेशानी, पुरे शरीर में गर्मी सी लगने लगे, पसीना आना, थोड़ा खाना खाने पर पेट भारी होना, त्वचा का कलर में बदलाव होना यह सारी प्रोब्लम नजर आए तो अपना लीवर टेस्ट करवाए।

क्योकि में ऐसे में लिवर को स्वस्थ रखने के लिए और शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने के लिए एक खास ड्रिंक आपकी मदद कर सकता है। इनमें से किसी एक ड्रिंक को अगर आप 3 दिन पीते हैं, तो लिवर में मौजूद सारी गंदगी सारे टॉक्सिन्स बहार निकल जायगे।

आजकल लोगों की जिस तरह की लाइफस्टाइल हो गई है, उसका असर लिवर की सेहत पर भी काफी पड़ता है। खराब खानपान की आदत से लिवर के रोग होने की संभावना अधिक देखने को मिल रही है। लिवर पूरे शरीर के लिए काम करता है

और इसका अस्वस्थ होना आपकी सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। ऐसे में जरूरी है कि अपने शरीर के इस महत्वपूर्ण की तरफ आप ध्यान दें। हम जो भी खाते-पीते हैं, वह हर चीज हमारे लिवर से होकर जाती है, इसलिए इसका स्वस्थ्य होना बहुत ही जरूरी है।

यदि आप लीवर की बीमारियों से खुद को बचाए रखना चाहते हैं और शरीर से अवांछित चीजों या टॉक्सिन पदार्थों को बाहर निकालना चाहते हैं, तो लिवर को हेल्दी रखना जरूरी है। इस अंग को सही तरह से अपना कार्य करवाने के लिए जरूरी है कि इसे डिटॉक्स किया जाए।

आप लिवर को कुछ नेचुरल हेल्दी ड्रिंक्स के सेवन से हेल्दी रख सकते हैं। जानें, कुछ हेल्दी ड्रिंक्स के बारे में, जो लिवर की सफाई प्राकृतिक तरीके से कर सकते हैं।तो लिवर को हेल्दी रखना जरूरी है। शरीर का यह अंग सही तरह से अपना कार्य कर सके इसके लिए जरूरी है

कि इसे डिटॉक्स किया जाए। आप लिवर को कुछ नेचुरल हेल्दी ड्रिंक्स के सेवन से हेल्दी रख सकते हैं। जानें, कुछ हेल्दी ड्रिंक्स के बारे में, जो लिवर की सफाई प्राकृतिक तरीके से कर सकते हैं।

यह भी पढ़े ⇒लीवर को स्वस्थ (Liver problem) रखने के घरेलु उपाय ⇐

लीवर डिटॉक्स ड्रिंक लेने से पहले 1-2 पहले हल्का खाना शुरू कर दे जैसे की जूस या हरी सब्जिया कम तेल वाले भोजन ले क्योकि आपका लिवर टॉक्सिटफ्री होने के लिए तैयार ही जायगा

Liver detox

लौकी डिटॉक्स ड्रिंक – लौकी एक गिलास जूस आ जाए जितनी लौकी लेनी है , हल्दी एक चम्मच , गिलोय 30 ml जूस लेना है , नींबू का रस एक चम्मच , काला नमक एक चम्मच, हरा धनिया 50 ग्राम ।

लौकी और धनिया को मिक्सी में पीस ले बाद में सारी सामग्री मिला के एक गिलास खाली पेट पी जाए यह जूस शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है, इम्युनिटी को बढ़ाता है, इस ड्रिंक को 2-3 दिन तक लगातार लेना है और इसे हर 6 महीने में लेना चहिए

हल्दी वाली चाय – भारतीय भोजन में हल्दी एक मुख्य मसाला है। यह आपके लिवर का हेल्दी रखने के लिए सबसे शक्तिशाली मसाला भी है। आप हल्दी की चाय पिएं। उबलते पानी में एक चम्मच पिसी हुई हल्दी डालें और इसे 10 मिनट तक उबालें।

इसमें थोड़ा सा नींबू का रस और एक चुटकी काली मिर्च मिलाएं। हल्दी आपके लिवर को किसी भी तरह के नुकसान से बचाती है। लिवर को नई कोशिकाओं को दोबारा बनाने में मदद करती है। यह लिवर के सूजन, लिवर रोग (liver disease) के संभावित कारणों से भी लड़ती है।

गाजर का डिटॉक्स ड्रिंक – गाजर का जूस 150 ml, आंवला का जूस 30 ml, एक चम्मच सेंधा नमक इन सब को अच्छे से मिक्स करके पी ले सुबह के नाश्ते के बाद लेना और इसे लगातार एक सप्ताह तक लेना है

किशमिश डिटॉक्स ड्रिंक – 2 कप पानी (लगभग 400 मिलीग्राम), 150 ग्राम किशमिश, शहद एक चम्मच बनाने का तरीका 150 ग्राम गहरे रंग की किशमिश ले और अच्छी तरह धो लें, अब दो कप पानी को अच्छी तरह उबाल लें,

अब किशमिश डाले करीब से करीब 20 मिनिट तक उबलने दे , अब उबलने के बाद गैस बंद कर दे और इसे आत भर छोड़ दे और इसे ड्रिंक को सुबह एक चमच शहद मिलाकर इस ड्रिंक को पी ले और आप किशमिश भी खा सकते है

इस ड्रिंक का सेवन सुबह खाली पेट करे लगातार आप 3 दिन का प्रयोग करे इसके सेवन से आपका लीवर तंदरुस्त हो जायगा साथ ही शरीर में मौजूद सारे विषाक्त पदार्थ बाहर निकल जायगे और आपका लीवर पूरी तरह से स्वस्थ हो जायगा।

पालक का डिटॉक्स ड्रिंक- पालक का जूस 100 ml, चुकन्दर का जूस 30 ml, काली मिर्च एक चुटकी इनको मिक्स करके नाश्ते के बाद पी ले इसे लगातार एक सप्ताह तक लेना है इस ड्रिंक को आप बच्चो को भी दे सकते है

इसमें गाजर और आनार का जूस निकाल कर दे सकते है गरोइंग बच्चों में लीवर सही तरह काम नही कर अगर वह सही खाते पीते नही या उनकी जो ग्रोथ सही नही हो रही तो आप यह ड्रिंक दे सकते है

बीटरूट जूस – बीटरूट में बीटेन होता है, जो लिवर को हेल्दी रखने के साथ-साथ बाइल के उत्पादन में मदद करता है। इस जूस को बनाने के लिए बीटरूट, काली मिर्च और तुलसी के पत्ते सबको अच्छी तरह से पीस लें। इसका सेवन करने से लीवर स्वस्थ होता है और शरीर में खून की कमी भी दूर होती है।

नींबू का रस – नींबू लिवर से टॉक्सिन्स को निकालकर उसको सही तरह से काम करने में मदद करने के साथ-साथ इंटेस्टाइन को भी साफ रखता है। इसके अलावा, ये पाचन शक्ति को भी बढ़ाता है सुबह एक गिलास गुनगुने पानी में आधा नींबू का रस मिलाकर पिएं।

⇒अपने लीवर को बचा लो नही तो होगी सभी को यह बीमारी – Save Your Liver From These Habits. ⇐ click करे