यज्ञ द्वारा रोगों की चिकित्सा-Cure of diseases by sacrifice

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Cure of diseases by sacrifice

हवन द्वारा रोगों की चिकित्सा (Cure of diseases by sacrifice)-

हवन एक ऐसी क्रिया है जिसको करने से व्यक्ति के तन-मन सबकी शुद्धि हो जाती है और इसी के कारण मन आध्यात्मिकता की ओर झुक जाता है व्यक्ति को परम शांति मिलती है इसलिए दैनिक जीवन में हवन को भी एक नित्य कर्म की तरह स्थान देना चाहिए। शास्त्रों ने नित्य पंचयज्ञ करने के लिए हर गृहस्थ को आदेश दिया है। पूजा भजन के समय थोड़ा सा हवन नित्य कर लेना चाहिये। शास्त्रीय विधि व्यवस्था मंत्र या “ॐ भूर्भुवः स्वः” इन आहुतियों से जितनी सामर्थ्य हो उतना घी और सामग्री लेकर हवन कर लेना चाहिए। समिधा की लकड़ी आम, बड़, पीपल, गूलर, छोंकर, बेल, ढाक आदि के पुराने पेड़ की खूब सूखी हुई लकड़ी लेनी चाहिए। चंदन, देवदारु, सरीखी सुगंधित लकड़ियाँ भी थोड़ी बहुत मिला ली जाय तो और भी उत्तम है।

हवन सामग्री में आवश्यक वस्तुएं होनी चाहिए – चन्दन, जायफल, इलायची, जावित्री, केशर, गिलोय, अगर तगर, बंशलोचन, असगंध, गूगल, लौंग, ब्राह्मी, पुनर्नबा जीवन्ती, कचूर, छार छबीली, शतावरि, खस, कपूर-कचरी, कमलगट्टा, शीतल चीनी, तालीस पत्र, बच, नागकेशर, रास्ना, आँवला, दालचीनी, जटामासी, इन्द्र जौ, मुनक्का, छुहारा नारियल की गिरी, चिरौंजी,पिस्ता, अखरोट,किशमिश। यह सभी चीजें समान भाग होनी चाहिए पर केशर बंसलोचन जैसी अधिक महंगी चीजें आर्थिक कारणों से कम भी डाली जा सकती हैं। सामग्री नई, ताजी सूखी और साफ होनी चाहिए। इस सामग्री कूट कर उसमें तिल, जौ, चावल, उर्द, शक्कर और घी मिला लेना चाहिए। इस सामग्री से हवन करने से हवन के आसपास के लोगों को बलवर्धक, मानसिक शान्तिदायक और रोग नाशक तत्व प्राप्त होते हैं। फलस्वरूप उनके स्वास्थ्य की स्थिति उन्नत एवं अच्छी होने लगती है। यदि किसी रोग विशेष की चिकित्सा के लिए हवन करना हो तो उसमें उस रोग को दूर करने वाली ऐसी औषधियाँ सामग्री में और मिला लेनी चाहिए जो हवन करने पर खाँसी न उत्पन्न करती हों।

यह मिश्रण इस प्रकार हो सकता है

1. साधारण बुखारों में – चिरायता, करंजे की गिरी, तुलसी की लकड़ी, तुलसी के बीज

2. विषम ज्वरों में – लाल चन्दन, नीम की गुठली, अपामार्ग, पाढ़ की जड़, नागरमोथा

3. जीर्ण ज्वरों में – खिरेंटी, कूट, पोहकर मूल, केशर, काक सिंगी, नेत्रवाला, त्रायमाण

4. जुकाम में – गुलाब के फूल, पोस्त, गुलबनफसा, अनार के बीज, दूब की जड़

5. खाँसी में – इलायची, बहेड़ा, उन्नाव, कुलंजन, मुलहठी, अड़ूसा, काकड़ा सिंगी

6. चेचक में – धनिया, श्योनाक, चौलाई की जड़, वंशलोचन, धमासा

7. श्वाँस में – बबूल का वक्कल, मालकाँगनी, बड़ी इलायची, धाय के फूल, पोन्त के डौड़े

8. प्रमेह में – शतावरि, सालममिश्री, लजवंती के बीज, ताल मखाना, मूसली, गोखरु बड़ा

9. प्रदर में – सुपाड़ी, माजूफल, अशोक की छाल, कमल केशर मोचरस

10. बात व्याधियों में – धमासा, असगंध, बिदारीकंद, मैंथी, सहजन की छाल, रास्ना, पुनर्नवा

11. रक्त विकार में – सरफोंका, जबासा, उसवान, मजीठ, हरड़, बावची

12. हैजा में – सोंफ, कपूर, चित्रक धनियाँ, कासनी

13. अनिद्रा में – काकजघा पीपला-मूल, भारंगी

14. उदर रोगों में – दालचीनी, जीरा, आलू बुखारा, पीपरिं,चव्य, चित्रक तालीस पत्र।

15. दस्तों में – मौलश्री की छाल, ताल मखाना, छुहारा, अतीस, बेलगिरी, ईसबगोल, मोचरस।

16. पेचिश में – पोदीना, आम की गुठली, कतीरा, मरोड़फली, अनारदाना

17. मस्तिष्क संबंधी रोगों में – ब्राह्मी, बच शतावरी ,गोरख मुँडी, शंखपुष्पी

18. दाँत के रोगों में – बबूल की छाल, इलायची, चमेली की जड़, शीतल चीनी, अकरकरा

19. नेत्र रोगों में – रसोत, हल्दी, लोध, कपूर, लौंग, लाल चन्दन

20. घावों में – तुलसी की जड़, तिल, नीम की गुठली, आँवा हल्दी,पद्माख, दूब की जड़, बड़ की जटाएं।

21. बंध्यत्व में – जटामासी, कूट, शिलाजीत, नागरमोथा, पीपल वृक्ष के पके फल, शिवलिंग के बीज,गूलर के पके फल, बड़ वृक्ष के पके फल, भट कटाई।

रोगों की निवारक औषधियाँCure of diseases by sacrifice

इसी प्रकार अन्य रोगों के लिए उन रोगों की निवारक औषधियाँ मिलाकर हवन सामग्री तैयार कर लेनी चाहिये। स्वस्थ मनुष्य को अपनी तन्दुरुस्ती बनाएं रखने और उसे बढ़ाने के लिए रोजाना गायत्री मंत्र के साथ हवन करना चाहिये। इससे आध्यात्मिक लाभ भी होता है। रोगी मनुष्य यदि चल फिर सकता हो तो उसे आसान पर पूर्व की ओर मुँह करके बैठना चाहिये और स्वयं हवन करना चाहिए। यदि रोगी चल-फिर नही सकता हो तो उसे हवन के समीप मुलायम बिस्तर पर लिटा देना चाहिये। जिस कमरे में रोगी का रहना होता हो उस कमरे की खिड़कियाँ खोलकर यदि हवन किया जाय तो बहुत अच्छा है। परन्तु इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि कमरे में जरूरत से ज्यादा गैस भर जाने के कारण रोगी को कष्ट नहीं हो। हवन की अग्नि प्रज्वलित रहनी चाहिए  धुँआ सदा हानिकारक होता है, चाहे वह लकड़ी का हो चाहे सामग्री का हो। जलती हुई अग्नि से ही औषधियों की सूक्ष्मता ठीक प्रकार होती है। घर में हवन की वायु के बस जाने से अनेक प्रकार के अस्वास्थ्यकर विकार नष्ट हो जाते है। हवन के समय हल्के ढीले और कम वस्त्र पहनने चाहिये। यदि मौसम अनुकूल हो तो नंगे बदन ही बैठना चाहिये जिससे कि यज्ञ की वायु शरीर को बाहर भी स्पर्श करे। स्नान करके बैठना सबसे उत्तम होता है पर यदि स्थिति अनुकूल न हो तो हाथ मुँह धोकर गोमूत्र छिडककर भी बैठ सकते है।

यदि विधिवत हवन न हो सके तो एक मिट्टी के सकोरे में लकड़ियाँ जलाकर उस पर घी और हवन सामग्री डालकर रोगी के समीप रख देना चाहिए। एक उपाय यह भी हो सकता है कि सामग्री को कूट कर घी के साथ उसकी बत्ती सी बना ली जाय और धूपबत्ती की तरह उसे जलने दिया जाय। हवन के लिए प्रातःकाल का समय सबसे उत्तम होता है। बिना विशेष आवश्यकता के रात्रि में हवन नहीं करना चाहिये। हवन के समीप जल का भरा हुआ एक पात्र रखना कभी नही भूलना चाहिये। यदि बड़ा हवन हो हवन कुण्ड के चारों ओर पानी से भरे
पात्र रख देने चाहिये। कारण यह है कि हवन में जहाँ उपयोगी वायु निकलती है वहाँ कार्बन सरीखी हानिकार गैस भी निकलती है। पानी उस हानिकर गैस को खींचकर अपने में चूस लेता है। इस पानी को सूर्य के सम्मुख अर्घ के रूप में फैला देने का विधान है। इस जल को पीने आदि के काम में नही लेना चाहिये।

वायु चिकित्सा- वायु चिकित्सा का दूसरा तरीका प्राणायाम है।  प्राणायाम के द्वारा अनेक बिमारियों के रोगी स्वास्थ्य लाभ ले चुके हैं। विशेष रोगों के लिए विशेष प्राणायाम भी हो सकते हैं। यह साधारण और सभी रोगियों के लिए उपयोगी प्राणायाम है।

(1) प्रातःकाल खुली हवा में मेरुदण्ड सीधा कर पद्मासन से समतल भूमि पर एक छोटा आसन बिछा कर बैठें।

(2) अपने फेफड़ों में जितनी हवा भरी हो उस सबको धीरे-धीरे बाहर निकाल दें।

(3) जब फेफड़े बिल्कुल खाली हो जाए तो धीरे-धीरे साँस लेना आरम्भ करें और जितनी वायु छाती एवं पेट में भरी जा सके भर लें।

(4) जितने सेकंड में हवा अंदर खींची गई हो उसके एक तिहाई समय तक वायु को भीतर ही रोकें।

(5) अब धीरे-धीरे साँस छोड़ना आरम्भ करें और पेट को बिल्कुल खाली कर दें।

(6) जितनी देर में साँस को बाहर निकाला हो उसके एक तिहाई समय तक बिना साँस लिए रहें।

(7) फिर पूर्ववत वायु खींचना आरम्भ कर दे यह एक प्राणायाम हुआ।

ऐसे प्राणायाम सामर्थ्य के अनुसार एक समय में 10-15 बार किये जा सकते हैं। घण्टे दो-दो घण्टे के अन्तर से यह प्राणायाम करते रहने चाहिये। साथ में
‘ॐ’ का या गायत्री मंत्र का जप भी करते रहना चाहिये। जैसे आँधी आने से आकाश में वायु की शुद्धि हो जाती है उसी प्रकार प्राणायाम से वायु की प्रचण्ड
हलचल द्वारा भीतरी विकास उमड़ कर साँस द्वारा बाहर निकल जाते हैं। फेफड़े, मस्तिष्क, हृदय, आमाशय,आँत, पेडू और गुर्दे, को इस प्राणायाम द्वारा बल मिलता है और आवश्यक व्यायाम हो जाता है। जिससे कमजोर अंगों में मजबूती बढ़ती है और बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य सुधरता जाता है।

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