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क्या रासायनिक खेती मानव जाति के लिए हानिकारक(Harmful chemical farming)है? आपको जानकर हैरानी होगी!

रासायनिक खेती से मानव जाति के कितनी नुकसानदायक है?(Harmful chemical farming)

आधुनिक मनुष्य अपने को प्रकृति का अंग अनुभव करता है। प्रकृति से संघर्ष में वह भूल जाता है कि इस संघर्ष में वह जीत भी जाए तो भी नुकसान उसी का होगा। आधुनिक कृषि प्रकृति पर अधिकार स्थापित करने का सबसे बड़ा क्षेत्र बन गई है।

भारत में बड़े गर्व के साथ ऐसे रसायनों का इस्तेमाल होता है जो दुनिया भर में प्रतिबंधित है। इसका परिणाम यह है कि एक औसत भारतीय एक दिन में 0.27 मिलीग्राम कीटनाशक आहार के साथ अपने पेट में डालता है। गेंहू में कीटनाशको का स्तर 1.6 से 17.4 पीपीएम,चावल में 0.8 से 16.4 पीपीएम,दालों में 2.9 से 16.9 पीपीएम,मूंगफली में 3.0 से 19.1पीपीएम, साग सब्जी में 5.00 से 68.5 पीपीएम तक कीटनाशक पाए जाते है। भारत दुनिया में कृषि रसायनों का चौथा सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। यहाँ रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशक से जमीन की गुणवत्ता घट रही है। इनके दुष्प्रभावों से मनुष्य,पशु-पक्षी,पानी और पर्यावरणीय जीवन असुरक्षित हो गया है।

इन रसायनों के उपयोग की विधि में यह भी लिखा जाता है कि इस रसायनका छिडकाव करते समय नाक व मुँह को कपड़े से,आँखों को चश्मे से और हाथों को दस्तानों से ढक लें………क्यों? क्योंकि ये एक जानलेवा जहर है। यह जहर सब्जियों,अनाज,फलों और पानी के जरिये हमारे मानव शरीर में पहुँचने डायरिया,दमा,साइनस,एलर्जी, प्रतिरोधक क्षमता में कमी, मोतियाबिंद,कैंसर आदि रोग पैदा कर रहा है।

इसी का प्रभाव है कई मातायें अपने बच्चों को स्तनपान के जरिये कीटनाशक रसायनों के जहरीले तत्वों का सेवन करा रही है, जिससे बच्चे कई घातक बिमारियों की चपेट में आ रहे है। इस प्रदुषण से महिलाओ में स्तन कैंसर की वृद्धि हो रही है। उनके गर्भपात व मासिक धर्म की नियमितता पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। जबकि पुरुषों में प्रजनन क्षमता में निरंतर कमी आ रही है।

अब प्रश्न ये है कि ऐसे भंयकर खतरनाक रसायनों का प्रयोग खेती में क्यों किया जाता है, क्योंकि इन कीटों,फफूंद व रोगों के जीवाणुओं की कम से कम पांच फीसदी संख्या ऐसी है जो खतरनाक रसायनों के प्रभाव से बच जाते है व इनसे सामना करने की प्रतिरोधक क्षमता हासिल कर लेती है। ऐसे प्रतिरोधी किट धीरे-धीरे अपनी इसी क्षमता वाली नई पीढ़ी को जन्म देने लगते है जिससे उन पर कीटनाशको का प्रभाव भी नहीं होता है।

फिर इन्हें खत्म करने के लिए ज्यादा शक्तिशाली,ज्यादा जहरीले रसायनों का निर्माण करना पड़ता है। कीटनाशक रसायन बनाने वाली कम्पनियों के लिए यह एक बाजार है। अंतराष्ट्रीय धान अनुसन्धान संस्थान ने हाल ही में स्वीकार किया है कि धान पर कीटनाशको का छिडकाव धन और समय की बर्बादी है।

इस बात को फिलिंपिस,वियतनाम, बांग्लादेश के किसानों ने बिना कीटनाशकों के पहले से अधिक उत्पादन प्राप्त कर सिद्ध किया है। भारत में भी अब 60 लाख से ज्यादा किसान पदम् श्री प्राप्त कृषि ऋषि के नाम से प्रसिद्ध श्री सुभाष पालेकर जी द्वारा विकसित शून्य लागत प्राकृतिक खेती से सम्पन्न जीवन व्यतीत कर रहे है।

“हम किस कंपनी का जूता या कपड़ा पहनते है,यह तो हमें मालूम है।लेकिन किस किसान का पैदा किया अनाज खाते है,यह नहीं जानते।” जब तक हम जहर मुक्त अनाज,फल नहीं खायेगें तब तक हम कितने ही आयुर्वेद के नियमों का पालन करें हम स्वस्थ नहीं रह सकते है।

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