सोयाबीन के हानिकारक दुष्प्रभाव -Harmful side effects of soybeans

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Harmful side effects of soybeans

सोयाबीन के हानिकारक दुष्प्रभाव (Harmful side effects of soybeans)-

प्रोटीन का भूत इस तरह सर चढ़ा कि सोयाबीन जैसे अति उच्च प्रोटीन युक्त अखाद्य को भी खाने को प्रयत्न होने लगे। आहार विश्लेषण का चार्ट उठाकर देखें तो निश्चय ही ये प्रोटीन खाद्य होने के बावजूद इसमें क्षारीय गुण अधिक है अम्लत्व कम। माँसाहार और अनाज में इसके गुण सर्वोतम हैं परन्तु ये इतने कठोरतम खाद्य हैं कि केवल अंकुरित करके इसके पौष्टिक तत्व खुल नहीं पाते और शरीर को प्राप्त नहीं होते इसकी भीतरी परतों को खोलने के लिए इन्हें खूब तेज आंच में उबालना ही पड़ता हैं,तब कहीं जाकर इसका पोषण उपलब्ध होता हैं।

इसको दूध, दही, पनीर के रूप में उपयोग करने की कोशिश की जाती है। इसका स्वाद हमें रत्तीभर भी आकर्षित नहीं करता, बड़ा अजीब सा स्वाद लगता हैं। परन्तु आहार विश्लेषण चार्ट मीन इसके पोषक तत्वों को आकर्षण के कारण बेस्वाद होते हुए भी हम किसी तरह खा-पी ही लेंगें अन्यथा मसाले चीनी, गुड़, फल या बनावटी केमिकल स्वाद डालकर किसी तरह गले में उडेल लेते हैं प्रत्येक कदम पर आदमी ने अपनी अंतप्रेरणा की आवाज को ठुकराया हैं, उसकी बेइज्जती की है।

इसलिये ही वह अपने सहज स्वादिष्ट आहार (फल,मेवों) के बाजार बेस्वाद अखाद्य आहारों में उलझा हुआ है। सोयाबीन का कोई स्वरूप हमें आकर्षित नहीं करता अंकुरित सोयाबीन, सोया दही, सोया पनीर, थोड़े खाये जा सकते हैं जो अधिक बेस्वाद नहीं हैं। सोयाबीन के पीछे हाथ धोकर पड़ने की मूल वजह इस आहार का आकर्षण नहीं प्रोटीन का भूत हैं इसमें इतना अधिक उच्च प्रोटीन है (48 प्रतिशत) कि ये पाचन अंगों पर एक जबर्दस्त भार स्वरूप हैं। हमारे शरीर को इतने प्रोटीन की आवश्यकता ही नहीं हैं। पशु दूध -रहित प्रदेश चीन और जापान का यह परंपरागत आहार हैं। सोयाबीन में मांस से भी अधिक उच्च प्रोटीन है। मांसहार के नुकसान का यही एक मोटा कारण भी हैं। सोयाबीन के इस अत्यधिक उच्च प्रोटीन के हानिकारक प्रभावों की जानकारी आज नहीं तो कल निश्चय ही हमें इस अखाद्य आहार से (मांसहार की तरह) मुक्त कर देगी।

प्रो. मेफकोल, प्रो, ओसबोर्न तथा प्रो. मेंडेल ने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया है कि अति उच्च प्रोटीन खाद्य मूत्र पिंडो के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। शरीर थोड़े प्रमाण में ही प्रोटीन का उपयोग करता है बाकि प्रोटीन का चयापचन होने के बाद उसकी विषाक्तता निश्चय ही सुरक्षित नहीं हैं। उच्च प्रोटीन आहार अपनाकर हम पहले ही भयंकर रोगों में उलझ चुके हैं उस पर हमने सोयाबीन के रूप में एक शैतान और अपना लिया, मनुष्य बुद्धि को क्या हो गया है कुछ समझ में नहीं आता! धरती पर कोई खाने योग्य फल-मेवें अधिक पैदा नही करेगा पर अखाद्य वस्तुओं के पीछे हाथ धोकर पड़ गया हैं।

जब मेवें जैसा इतना स्वादिष्ट आहार हमारे लिए उपलब्ध हैं तो सोयाबीन जैसे बेस्वाद भोजन ही के पीछे भागने का क्या तुक हैं ?अत्यधिक शारीरिक परिश्रम करने वाले लोग ही इसका उपयोग कर सकते हैं। अंततया रोगी होकर क्योंकि परिश्रम करने वालों को प्रोटीन की नहीं, शक्ति खर्च के लिए शर्करा खाद्यों की अधिक आवश्यकता होती हैं प्रोटीन से न तो शर्करा और न ही शक्ति प्राप्त होती हैं। बल्कि उच्च प्रोटीन की विषाक्तता परिश्रम और शक्ति में बाधा बनते हैं, मददगार नहीं। मानसिक श्रम वाले तो इससे बचकर ही रहें! सोयाबीन, मेवों के अभाव में अनाज की तरह ही जीवित रहने का इमरजेंसी खाद्य है, इसे खाकर ज़िंदा रह सकते हैं परन्तु रोगों के साथ। सौयाबीन से गैस बहुत बनती हैं जिसके कारण गैस सम्बन्धित कई वायुरोग बढ़ जाते हैं। कहावत सही हैं कि ”आसमान से गिरे तो खजूर में अटके” मांसहार से निकले तो सोयाबीन पर भटके परन्तु धरती पर नहीं उतर सके। ख़ैर धरती दूर भी तो नहीं- शायद लौट ही आएँ। और लोगों से प्रोटीन का भुत उतर जाएँ।

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