बच्चों के लिए प्राकृतिक आहार (Natural diet for children) – जिसे खाने से बच्चे कभी बीमार नहीं पड़ेंगे

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Natural diet for children

बच्चों के लिए प्राकृतिक आहार (Natural diet for children) – जिसे खाने से बच्चे कभी बीमार नहीं पड़ेंगे। दोस्तों पोस्ट थोड़ी बड़ी है पर इसमें जो जानकारी है वह बच्चो के लिए बहुत ही महत्व पूर्ण है इसलिए इस पोस्ट को पूरी जरुर पढ़े। 

बच्चों को जन्म से ही प्रकृतया (स्वभाव से ही) प्राकृतिक आहार के प्रति भरपूर आकर्षण होता है। उनकी स्वाभाविक अंतप्रेरणा हमेशा इसी आहार की और रहती है, परन्तु इस सहज अंतप्रेरणा को नष्ट कर देता है हमारा गलत आहार का वातावरण, माँ-बाप की अज्ञानता एवं कमजोरियाँ, गलत सामाजिक एवं स्कूल का वातावरण। माँ-बाप अज्ञानतावश आग्रहपूर्वक (जबरदस्ती) बच्चों पर वही थोपते हैं जो परम्परागत अप्राकृतिक आहार एवं जीवन निर्वाह हेतु वजह स्वयं वहन करते आये हैं। 
परिणामस्वरूप बच्चे अपनी सहज, प्राकृतिक अंतप्रेरणा को भूलकर गलत आहार-विहार एवं परम्परा में ढलकर ठीक माँ-बाप और अपने पूर्वजों की तरह महारोगों की जड़ें मजबूत करते चले जाते हैं। शिशु अवस्था से लेकर बड़े होने तक जितने रोग बच्चों को होते हैं, उन्हें हम सभी स्वाभाविक जीवन का अंग मानकर ईश्वर, भाग्य, प्रकृति, कीटाणु , वातावरण या मौसम के ऊपर दोष थोपकर अपने आप को सांत्वना दे लेते हैं और दु:खी हो लेते हैं।
लेकिन सत्य तो यह हैं कि बच्चे बीमार होते ही नहीं, बल्कि बीमार किये जाते हैं। इसका सीधा कारण है कि बच्चों को जो आहार मिलना चाहिये वह न मिलकर गलत आहार मिलता है और जब शरीर इन गलत आहारों के प्रति प्रतिक्रिया कर रोग प्रदर्शन करता है तो हम आहार में सुधार करने के बजाय घातक टीके, दवाइयों द्वारा रोग को दबाने का प्रयास करते हैं और जीवन भर शरीर से लड़ाई करते रहते हैं, जब तक कि यह महारोगों में ढलकर नष्ट न हो जाये। 
बच्चे को जन्म से 2 साल तक माँ का दूध मिलना चाहिये, परन्तु बदनसीब माताएँ अपना दूध न पिलाकर गाय-भैंस जैसे जानवरों का दूध पिलाती हैं जो बच्चों के लिए अनुपयुक्त आहार है। इन जानवरों का दूध पाचन तन्त्र पर बहुत भारी पड़ता है जिससे बच्चे कई रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं। 2 साल से पहले अच्छी तरह से दांत नहीं आने तक बच्चों को अनाज (स्टार्ज) किसी भी रूप में नहीं देना चाहिये, क्योंकि अनाज अच्छी तरह चबाये बिना पचता ही नहीं। पूरे दांत नहीं आने तक अनाज पचाने की क्षमता बच्चों में नही आती नहीं। 
यही अनाज शरीर के अंदर सड़कर कई रोगों के रूप में शरीर से निकलने की कोशिश करता है तो हम उसे दवाओं से दबाकर बड़े रोगों की जड़े मजबूत करते हैं। इस लड़ाई में कई बच्चे असमय मर भी जाते हैं (जिसे यूँ कह सकते हैं कि माँ -बाप मिलकर और डॉक्टर मिलकर अज्ञानतावश हत्या कर देते हैं।) 2 साल तक बच्चे को केवल दूध-फल तथा जूस ही देना चाहिए,अन्न, दालें, ब्रेड, बिस्किट,चाय भूलकर भी नहीं देने चाहिये। 
प्रकृति का यह सीधा नियम हैं। 2 साल के बाद दांत पूरे आ जाने के बाद उन्हें दूध की उसी तरह बिलकुल आवश्यकता नहीं रहती है, जिस तरह गाय के बछड़े को विकास के लिए अपनी माता के दूध की आवश्यकता नहीं रहती जो बच्चे दूध पीते हैं उनका बीमार पड़ना निश्चित हैं। बच्चे दूध पीते रहते हैं या माँ-बाप दूध पिलाते रहते हैं। और बच्चे बार-बार बीमार पड़ते रहते हैं। जिस तरह गाय का बढ़ता हुआ बच्चा दूध भूलकर घास खाने लगता हैं, उसी तरह मानव के बच्चे अपनी घास (यानि फल-मेवे) खाना चाहिये। जो दूध गाय के बढ़ते हुए बच्चे को स्वास्थ्य एवं पोषण नहीं दे सकता, वह दूध एक परायी जाती मानव के बच्चे के लिए कैसे स्वास्थ्यवर्धक हो सकता हैं ? जो बच्चे प्राकृतिक आहार ग्रहण करते हैं, वह कभी बीमार नहीं पड़ते। 
जब तक आपके घर में मिठाई, नमकीन, ब्रेड,बिस्किट, कोल्ड ड्रिंक्स, आइसक्रीम, पेस्टी, जैम, सोस,जैसी घातक स्वास्थ्यनाश्क चीजें मौजूद रहेंगी, आपके बच्चे प्राकृतिक आहार कभी नहीं खायेंगे (संयोगवश भले ही कोई खा लें) क्योंकि ये चीजें झूटे स्वाद की उत्तेजना के कारण बगैर भूख या झूठी भूख से भी खाई जा सकती हैं,परन्तु प्राकृतिक आहार बगैर सच्ची भूख के कभी अच्छे नहीं लगते, क्योंकि प्राकृतिक आहार में झूठी और अनावश्यक उत्तेजना होती ही नहीं हैं। इन हानिकारक वस्तुओं को आप शौक से कभी-कभार खिला सकते हैं,परन्तु नियमित कभी नहीं खिलाना चाहिये। 
प्राकृतिक आहार को बढ़ावा देने के लिए गलत आहार घर में लाना बंद कर,सही पौषणयुक्त,स्वास्थ्यवर्धक प्राकृतिक आहार जैसे- फल, सूखे फल,सूखे मेवे अंकुरित दालें, जूस का वातावरण पैदा करें। घर में बार-बार हानिकारक व्यज्जन बनाने का बढ़ावा नहीं दें। सादा भोजन की आदत डालें। अक्सर या नियमित किसी भी तरह के चटपटे व्यज्जन बनते रहेंगे तो प्राकृतिक आहार का वातावरण कभी नहीं बनेगा। चटपटे व्यज्जन एक सप्ताह या 8-10 दिनों में एकाध बार बनाकर आनन्द ले सकते हैं। जो माँ-बाप यह सोचते हैं कि हमारे बच्चे प्राकृतिक आहार खाये और खुद चटपटे व्यज्जन खाने में लगे रहते हैं अथवा स्वयं प्राकृतिक आहार को नहीं अपनाते तो यह आशा व्यर्थ हैं।

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यदि माता-पिता स्वयं प्राकृतिक आहार अपनाएंगे तो बच्चे अपने-आप प्राकृतिक आहार के शौकीन हो जायेंगे। प्राकृतिक आहार बच्चों पर कभी थोपे नहीं- प्राकृतिक आहार के प्रेमी माँ-बाप अधिकतर बढ़िया पौषण मिलने के उद्येश्य से बच्चों को बार-बार टोक-रोककर प्राकृतिक आहार खिलाने का प्रयास करते हैं या जबरदस्ती करते हैं, जिसका कई बार उल्टा असर हो जाता है और बच्चा प्राकृतिक आहार का दुश्मन बन जाता हैं। दूसरी और माँ-बाप तनावग्रस्त रहते हैं। 
बच्चों को जब तक प्राकृतिक आहार के प्रति सहज लगाव व आकर्षण नहीं होगा, तब तक वह भय या संकोच के बारे में भले ही खा लें परन्तु आत्मा से कभी नहीं खायेंगे। सभी बच्चों को प्राकृतिक आहार के प्रति भरपूर आकर्षण रहता हैं इसलिये सारा प्रयास वातावरण पैदा करने के लिए करें, थोपने के लिए नहीं। 
किसी कारणवश घर में अप्राकृतिक आहार का वातावरण पैदा हो जाए तो बच्चो को सहज रूप से अप्राकृतिक आहार खाने दें क्योंकि गलत वातावरण पैदा कर आप उन्हें सही आहार नहीं खिला पायेंगे परन्तु भविष्य में सचेत रहें कि ऐसा गलत वातावरण बार-बार पैदा नहीं हो आधुनिक युग में बच्चों को अप्राकृतिक आहार से बचना बहुत कठिन हैं, या नामुमकिन हैं इसलिए अप्राकृतिक आहार (जैसे,आइसक्रीम,गोलगप्पे, चाट, तली चीजे, फास्टफूड, भेलपुरी इत्यादि) आनन्द से खाने का सप्ताह में दिन तय कर लें या घर में बनाकर उनकी मनपसन्द वस्तु उन्हें अवश्य खिलायें, साथ ही साथ समयानुसार उन्हें इन आहारों के दुष्प्रभाव के बारे में भी प्रेम से समझाते रहें। टोककर या डाटकर नहीं। याद रहे- बच्चे अपने अनुभव से सीखते हैं, आपके अनुभवों से नहीं। इसलिए अपना अनुभव समझा सकते। 
अप्राकृतिक आहार खाने से पहले ऐसा वातावरण पैदा करें जिससे पहले ही भरपेट फल या सलाद या जूस लिया जा सके घर में पकौड़े या मिठाई बना रहे हैं तो पहले उन्हें सलाद या फल काटकर दे दें ताकि इन्तजार करते-करते वे इससे पेट भरते रहें। अप्राकृतिक आहार के साथ सलाद खा सकते हैं,परन्तु जूस या फल कभी नहीं खायें। ये साथ में शीघ्र सड़ जाते हैं। 
इससे फल के बारे में गलत अनुभव एवं धारणा बन जाती हैं यह भी ध्यान रहे कि प्राकृतिक आहार बच्चों को भरपूर उपयोग करवाने का अर्थ यह नहीं हैं कि उसके व्यक्तिगत अप्राकृतिक आहार के शौक को मार दिया जाए या दबा दिया जाए। प्राकृतिक आहार खिलाने से पहले भूख सिखायें प्रत्येक बच्चा स्वाभाविक भूख से ही खाने का आदीहोता है,परन्तु माँ-बाप या परिवारजन इस सहज स्वाभाविक भूख की हत्या कर उन्हें ठूंस-ठूंसकर, डर -धमकाकर या लालच देकर समय-असमय पेट में आहार उड़ेलना सिखा देते हैं, वास्तविक भूख से नहीं। 
इसके कारण बच्चा बीमार तो पड़ता ही रहता है साथ ही जीवन का सबसे अनमोल खजाना “सच्ची कड़क भूख” को भी खो बैठता है। माँ-बाप अपने हिसाब से बच्चें को खिलाना चाहते हैं, बच्चे की भूख, पाचन के हिसाब से नहीं। जो बच्चा भूख नहीं सीख सकता वह जीवन नें कभी स्वस्थ नहीं रह सकता,क्योंकि भूख का अर्थ ही हैं पचने की पूरी तैयारी और पूर्ण पौषण की गारंटी जबकि बगैर भूख के खाने का अर्थ है आहार का सड़ना और कुपौषण। आहार भी बेकार गया, भूख लगने पर खाया हुआ भोजन पचा तो पौषण बना, जो सड़ गया उससे पौषण कैसा ?इसलिये बच्चे को हमेशा पूछकर खिलायें कीउसको सचमुच भूख है या नहीं। 
अगर उसको भूख नहीं है तो उसके लिए भोजन ढककर रख दें और यही सिखाये कि जब भूख लगे,तब खा लेना या मांग लेन। ध्यान रहे ! कोई बच्चा कभी भूखा नहीं रहता, भूख होगी तो वह अवश्य भोजन माँग लेगा। जिस दिन सच्ची भूख सिख गया, उस दिन वह स्वास्थ्य सीख जायेगा। और जब बच्चा भूख (माँग) के अनुसार आहार कार्यक्रम निश्चित करें। 
भूख सिखाने में पहले के चार-पांच दिन या सप्ताह भर बच्चा कुछ भी न मांगे या दिन भर में एक या 2 बार मांग करें तो चिंता नहीं करें, सप्ताह-पन्द्रह दिन में अपने -आप उसका पाचन दुरुस्त होकर अच्छी तरह भूख खुल जायेगी। बच्चे की भूख के पीछे चलें, अपनी धारणा के पीछे नहीं। जिस दिन आपका बच्चा सच्ची भूख से खाना सीख गया, उस दिन से सादा प्राकृतिक आहार को भी आनन्दपूर्वक बगैर नमक, चीनी, मसालों के खा पायेगा। सुबह उठने के बाद सिर्फ शिशुओं को भूख लगती है, बच्चों को नहीं। सुबह उठने के करीब 2- 3 घंटे बाद ही थोड़ी भूख खुलने लगती है। इसलिए सुबह 6 बजे उठकर 7 बजे स्कूल जाने वाले बच्चों को ये आहार दें। कोई भी एक चुनाव कर लें, 
अपनी सुविधानुसार -(1) केवल फल-रस या रसदार फल (2) मेवों का दूध (3) 10 भीगी बादाम या 10 खजूर (4) 10 बादाम + फल- रस। भूख न हो तो ये भी न दें। चिंता नहीं करें,बच्चा कमजोर नहीं होगा, भूख से खाने वाला बच्चे का वजन जल्दी बढ़ता है। साथ में रोटी और सब्जी या अन्य आहार बनाकर दे दें (ब्रेड जैसा घटिया आहार कभी नहीं दें) 10-11 बजे भोजनावकाश में उसकी भूख अच्छी तरह खुल जायेगी और वह खा लेगा। दोपहर को घर आने के बाद बच्चो को सबसे पहले भरपूर सलाद एवं अंकुरित दालें दें, थोड़ा चटपटा स्वाद लाने के लिए हरी चटनी, हरे मसाले का उपयोग करें। सलाद पूरा खा लेने के बाद ही उन्हें सादा भोजन परोसें। जिन बच्चों को आदत नहीं है उन्हें उनकी पसंद की सलाद देते हुए धीरे-धीरे समझाते हुए आदत डालें। 
आप स्वयं भी उनके साथ अच्छी तरह सलाद खायें। शाम को भूख लगने पर फल खिलायें या जूस पिलायें। मौसम के सस्ते से सस्ते फल-रस, जैसे गाजर, टमाटर, संतरा, गन्ने का रस बच्चों को पिलाने का वातावरण बनायें। रात को सिर्फ भर पेट फल खिलाये अथवा भरपेट केला-नारियल खिलाएं अथवा अंकुरित दालें (भेलपुरी की तरह बनाकर) सलाद के साथ खिलायें। इसके बाद भी भूख शिकायत हो तो थोड़ा- बहुत हल्का भोजन दे दें। रात को घर में खाना पकाये ही नहीं। बच्चों को दो बार से ज्यादा अनाज कभी नहीं दें अन्यथा वह प्राकृतिक आहार को अच्छी तरह उपयोग कभी नहीं कर पायेगा। एक बार अनाज स्कूल के टिफिन में, दूसरी बार अनाज दोपहर के भोजन में। 
घर का यह नियम पक्का कर लें की रात का भोजन नहीं पकेगा। तभी आप भरपूर फल या प्राकृतिक आहार का वातावरण बना पायेंगे। अगर कोई यह सोचता हो कि प्राकृतिक आहार अच्छी तरह खा लेने के बाद भोजन करेंगे तो वह दो प्रकार से अपना नुकसान कर रहा होगा एक तरफ अतिआहार का शिकार होकर-दूसरी तरफ किफायत की दृष्टि से – एक बार प्राकृतिक आहार का खर्चा भी लगा और भोजन का खर्चा भी – आर्थिक और शारीरिक दोनों नुकसान। 
बच्चों के दिमाग में यह निश्चित हो जाना चाहिये की रात को केवल प्राकृतिक आहार ही मिलने वाला हैं। यह कार्यक्रम बच्चों को समझाकर उनकी रजामंदी से निश्चित करना चाहिये, ताकि विरोध न हो। उन्हें प्रेम से समझा दें कि उन्हें दिन भर में एक बार फल, एक बार जूस, एक बार मेवा और एक बार सलाद अवश्य खाना हैं। दूसरे आहार चुक जायें, परन्तु प्राकृतिक आहार नहीं। अगर आप पका हुआ भोजन शाम को खाना चाहते हैं तो दोपहर को स्कूल से लौटने के बाद बच्चों को केवल फल या मेवों के मिल्क शेक या अंकुरित दालें दें, इस तरह दिन में एक बार मुख्य भोजन फलों का अवश्य बनायें।
 बच्चों की पसंद-नापसंद को समझें -कई बच्चे सभी प्राकृतिक आहार पसंद नहीं कर कुछ विशेष प्राकृतिक आहार ही पसंद करते हैं, कई बच्चे अंकुरित पसंद नहीं करते तो कई बच्चे आनन्दपूर्वक अंकुरित खाते हैं। कई बच्चे कोई विशेष फल खाते, कई विशेष सलाद नहीं खाते, ऐसी अवस्था में वह आहार खाने के लिए उन्हें मजबूर नहीं करें। जो प्राकृतिक आहार उनको पसंद आता हो, वही उनके लिए जुटायें। 
अनेक प्रकार के प्राकृतिक आहार आवश्यक नहीं, आप इस नियम को अच्छी तरह समझ लें कि शरीर को अधिक-से-अधिक अपक्व, कच्चा प्राकृतिक आहार देना है। अगर आपके गाँव या शहर में केवल एक-दो प्रकार के फल ही मिलते हैं तो मौसम अनुसार वह एक फल ही उस मौसम में भरपूर उपयोग करते रहें। सलाद में केवल गाजर ही भरपूर खायें। टमाटर ही खायें। मेवों में भी अगर केवल मूंगफली का उपयोग करें। इस तरह शरीर को अनेक प्रकार के प्राकृतिक आहार की नहीं, बल्कि अधिक-से-अधिक कच्चे (सुर्यपक्व) आहार की आवश्यकता है और कम-से-कम पक्व आहार की। 
पिकनिक या सफर में प्राकृतिक आहार- पिकनिक या सफर का कोई कार्यक्रम बनायें तो जितना आप गलत (घटिया) आहार को साथ में लेने की सोचते हैं उससे अधिक अब प्राकृतिक आहार को साथ लेने की सोचें। ऐसे अवसरों पर प्राकृतिक आहार और अधिक आनन्द देते हैं। सफर में सड़कों पर, स्टेशनों पर हर गाँव, शहर के विशेष-विशेष फल मिलते हैं, उनका आनन्द पहले लेने की सोचें। घटिया आहार चाहें तो उसके बाद अलग से खायें। पिकनिक पर जाना हो तो फल,सलाद या अंकुरित कोई न कोई प्राकृतिक आहार अवश्य साथ ले जायें। यह नियम पक्का बना लें कि प्राकृतिक आहार के बिना भोजन नहीं करें। धन्यवाद

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