प्राकृतिक आहार का सेवन (Natural dietary intake) करने वाले को योगा की जरूरत नही

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natural food and yoga

प्राकृतिक आहार का सेवन Natural dietary intake करने वाले को योगा की जरूरत नही मानव जीवन को प्रकृति ने इतना जटिल बनाया है कि वह कई प्रकार के आसन सीखे,फिर करें,और क्या योगासन के बिना स्वास्थ्य संभव ही नहीं? नहीं! ऐसा नहीं है। जीवन बड़ा सहज हैं। शरीर जब हल्का होता हैं तो सहज ही व्यायाम करने, उछलने, नाचने, दौड़ने को उत्सुक रहता है।

Natural dietary intake

हम व्यायाम डर के मारे या कर्त्तव्य समझकर (इच्छा न होने पर भी) अपने आप पर थोपते हैं,मजबूरी से करते हैं,हमें हमारा शरीर व्यायाम करने के लिए उत्साहित नहीं करता बल्कि मन का उत्साह या प्रभाव शरीर को लेकर किसी तरह व्यायाम करवाता है,इसलिये व्यायाम एक बोझ लगता है।
जब तक हम गलत आहार या अतिआहार द्वारा शरीर को भारी करते रहेंगे, व्यायाम हमेशा एक मजबूरी, एक बोझ लगता रहेगा। योगासन आवश्यक होते रहंगे, शरीर जकड़ता रहेगा, योगासन द्वारा उसे तोड़ते ही रहंगे, अंत में असफल होकर गिरे पड़ेंगे। जो लोग अपने आहार में अधिकतर अनाज, दालें,माँसाहार, दुग्धाहार का उपयोग करते हैं, उनका शरीर इन आहारों की अम्लता एवं विषाक्तता (विष द्रव्यों के) कारण भारी, कठोर एवं जकड़ा हुआ रहता है। ऐसे लोगों को योगासन अत्यंत आवश्यक होंगे,
अच्छे भी लगेंगे, लाभ भी मिलेगा, परन्तु आहार अगर इसी प्रकार का रहा तो वह जीवनभर जकड़न को योगासन द्वारा तोड़ना रहेगा। योगासन का भी शरीर आदी हो जाता है जो धीरे-धीरे बाद में पहले जैसा प्रभावित नहीं करता, अंत में हम गलत आहार के शिकार होकर गंभीर रोगों में जकड़ते चले जाते हैं। इसलिये योगासन करने वाले अगर अपने आहार में अधिक अनाज, दालें, मांसहार या दुग्धाहार का उपयोग करते रहेंगे तो अंत में असफल ही होंगे।योगासन स्वास्थ्य की प्राथमिक आवश्यकता है। अपक्वाहार या मिताहार से स्वास्थ्य, स्फूर्ति में वृध्दि के बाद इसकी उतनी आवश्यकता नहीं रह जाती है ।
ऋषि-मुनियों को ध्यान के लगातार प्रयोगों के कारण योगासनों की आवश्यकता महसूस हुई, क्योंकि ध्यान निष्क्रिय अभ्यास हैं। हमने पशुओं की अंगड़ाइयों को योगासन नाम दे दिया है। अंगडाई ही सही,सहज योगासन हैं। जिस तरह पशुओं एवं बालकों को योगासन की आवश्यकता नहीं है, उनमें सहज स्वाभाविक लचीलापन होता हैं।
वैसे ही अपक्वहारी का शरीर भी बालक के समान लचीला हो जाता है। योगासन अध्यात्म एवं ध्यान की प्रकृति के लिए साक्षीत्वभाव को
प्रबल करने के लिए उपयोगी हैं, परन्तु सामान्य जीवन के लिए सहज सक्रिय व्यायाम (दौड़ना,तेजी से चलना,नाचना,गाना,खेलना,तैरना) ही सही योग-व्यायाम हैं। अपक्वहारी एवं सक्रिय व्यायाम वालों के लिए योगासन निरर्थक हैं। अपक्वाहार द्वारा खोई स्नायु -शक्ति,कामशक्ति दुबारा जाग्रत हो जाती हैं

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(व्यायाम के बगैर नहीं)। ऐसे सैकड़ों मरीज जो कमजोर कामशक्ति के कारण विवाह नहीं कर पा रहे थे, अपक्वाहार एवं व्यायाम के द्वारा उन्होंने नवजीवन प्राप्त किया हैं। इससे श्रेष्ठ,अचूक दवा पूरी पृथ्वी पर नहीं है। अपक्वाहार से जहाँ एक और प्रबल कामशक्ति पुनर्जीवित हो जाती हैं, वहीं दूसरी और ब्रह्राचर्य भी सहज घटित हो जाता है, बार-बार सेक्स करने की आवश्यक उत्तेजना ही नहीं होती। सबसे पहले बात तो यह है कि अपक्वाहारी का प्रबल वीर्य एक स्वस्थ पीढ़ी का निर्माण करता है। उसकी आने वाली संतानों में अन्य प्राणियों की तरह ही कोई विकृति या रोग नहीं होते। संसार के किसी भी प्राणिवर्ग में कहीं भी कोई विकृति नहीं है,सिवाय मानव के। अन्य किसी प्राणी के लूले,लंगड़े,टेढे-मेढे, अंधे, रोगी एवं विकृत बच्चे पैदा नहीं होते, क्योंकि किसी भी प्राणी ने आज तक अपना मूल आहार नहीं बदला। केवल मानव ही ऐसा एक प्राणी है जो अपने मूल आहार से भटक कर पराया आहार, पक्व आहार एवं परिशोधित आहारों में उलझ गया। इसी का परिणाम है आज की कमजोर, रोगी सभ्यता, विकृत सभ्यता, प्रकृति का नियम है कि आहार अगर परिपूर्ण, आधा- अधूरा विकृत नहीं एवं पौषण से भरपूर होगा तो हमारी आने वाली पीढियाँ भी सम्पूर्ण शक्तियों एवं क्षमता सहित पैदा होती रहेंगी एवं उनमें कभी कोई रोग या क्षय का नामोनिशान नहीं होगा। यही नियम हर पौधे, प्राणी के साथ लागू है जो सामान्य बुध्दि द्वारा हम सभी समझकर स्वीकार कर सकते हैं। अपक्वाहार से और व्यायाम से आप ब्रह्राचारी बनें न बनें परन्तु स्वस्थ पीढ़ी के निर्माता एवं कारण अवश्य बनें।

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