न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट्स (Nutritional supplements)के नाम पर मानव स्वास्थ्य से खिलवाड़

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Nutritional supplements

न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट्स (Nutritional supplements) का भ्रमजाल जब भी यह पता चलता हैं कि कोई व्यक्ति किसी रोग से ग्रस्त हैं, भले ही वह मधुमेह हो या उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रोल हो या ह्रदय रोग और यहाँ तक कि मोटापे के रोगी को भी डॉक्टर दवाओं के साथ कुछ प्रकार के न्यूट्रीशनल सप्लीमेंट्स (Nutritional supplements) या मल्टीविटामिन टेबलेट लेने के लिए कह देते हैं।

चाहे आप अपने डॉक्टर की सलाह पर कोई न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट्स या टॉनिक ले रहे हैं या आप स्वंय ही अपनी सेहत में सुधार के लिए मल्टीविटामिन कैप्सूल या कोई मिल्क पाउडर ले रहे हैं। आपको यह समझना चाहिए कि ऐसे न्यूट्रीशनल उत्पाद लेना, न केवल व्यर्थ का अभ्यास हैं बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता हैं। इस पोस्ट का शीर्षक पढ़ते ही निश्चित रूप से आपको टी.वी. के प्रमुख चैनलों व समाचार-पत्रों में प्रकाशित हो रहे, रीवाइटल के विज्ञापन की याद ताजा हो गई होगी। वर्तमान में सलमान खान हर जगह इसका प्रचार करते हुए दिखाई देते हैं, वे दावा करते हैं कि न केवल वे पिछले पंन्द्रह सालों में इसका सेवन कर रहे हैं। बल्कि उनके पिता भी लम्बे अरसे तक इसी का सेवन कर चुके हैं। उनका कहना हैं कि उनकी सेहतमंद बॉडी का राज इसी में छिपा हैं। पहले युवराज सिंह रिवाईटल के ब्रांड एबेंसडर थे, जो अचानक ही दिखाई देने बंद हो गये।

(जब यह पता चला कि वे कैंसर से ग्रस्त हैं)। हालांकि हम सभी टी.वी. विज्ञापनों पर भरोसा नहीं करते पर ये भी तो सच हैं कि पिछले दस वर्षो में अपारंपरिक न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट बिजनेस ने दिन दौगुनी और रात चौगुनी तरक्की की हैं। आइए देखें कि किस प्रकार ये न्यूट्रिशनल यानी पोषण संबंधी सप्लीमेंट न केवल हमारे शरीर परन्तु मष्तिष्क पर भी प्रभाव डालते हैं (यह विश्वास कि ये कारगार हैं)।
हम एक साधारण से प्रश्न से बात आरम्भ करते हैं, कल्पना करें कि आपका एक साथी आपको बताता हैं कि उसे हाल ही में पता चला कि वह मधुमेह से पीड़ित हैं और डॉक्टर ने उसे मीठे से दूर रहने की सलाह दी हैं। अब एक क्षण के लिए सोचें, मीठे की बजाए आपके दिमाग में उसका क्या विकल्प आता हैं। हममें से तकरीबन लोग शुगर फ्री या ऐसा ही कोई और विकल्प लेने के बारे में विचार करेंगे। अब जरा अपने दिमाग के घोड़े दौडाएं और यह याद करने की कोशिश करें कि आपको यह जानकारी कहाँ से मिली कि अगर किसी को मधुमेह हैं तो वह मीठे के विकल्प में क्या ले सकता हैं। ‘हम सेहतमंद शुगर फ्री उत्पाद ले सकते हैं।’ क्या यह किसी टेक्स्ट बुक या डॉक्टर से पता चला था ? आपने किसी विज्ञापन को देख कर ही यह जानकारी ली होगी। आपको वह विज्ञापन याद आया होगा, जहाँ बिपाशा बसु कहती हैं कि – ”मेरी सेहत का राज हैं- शुगर फ्री”। इस विज्ञापन या बिपाशा बसु को आप कितना भरोसेमंद मान सकते हैं ? क्या वह कोई डॉक्टर या वैज्ञानिक हैं ?

आइए, थोड़ा और पीछे चलें ताकि हम जान सकें कि शुगर फ्री की कहानी कहां से शुरू हुई ? 1964 में, जी.डी सर्ल एंड कंपनी के प्रमुख केमिस्ट ने दुर्घटनावश एस्पार्टेम नामक रसायन को चख लिया, जो चीनी से दस गुना मीठी और बाजार में उपलब्ध चीनी से बीस गुना सस्ता था। यह तो धंधे के लिए काम की बात थी। उन्होंने मनुष्यों के उपभोग के लिए बड़े पैमाने पर इसे तैयार करने की योजना बनाई। इसके लिए एफ.डी.ए (फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) से ‘नो ऑब्जेक्शन’ सट्रिफिकेट मिलना आवश्यक था, इसका तात्पर्य होता कि यह उत्पाद मनुष्यों द्वारा प्रयोग में लाए जाने के लिए पूरी तरह से सुरक्षित हैं। एफ.डी.ए ने अपने विश्लेषण के दौरान पाया कि एस्पार्टेम (शुगर फ्री) के प्रयोग से मनुष्यों को 150 से अधिक संख्या में रोग होने की संभावना थी जिनमें मधुमेह, ह्रदय रोग, हाई कोलेस्ट्रोल, उच्च रक्तचाप व मोटापा आदि शामिल थे। एफ.डी.ए ने मनुष्यों के लिए बड़े पैमाने पर एस्पार्टेम के उत्पादन को मंजूरी नहीं दी। परन्तु जी.डी सर्ल एंड कंपनी ने तो ऐसा करने की ठान ली थी इसलिए उन्होंने 1982 वाले मामले की फाइल को दोबारा खुलवा लिया और तत्कालीन एफ.डी.ए कमिशनर ओर्थर हेज हल ने इस रसायन को मनुष्यों के प्रयोग के लिए मंजूरी दे दी। बाद में यह पता चला कि उसे उस कंपनी से आर्थिक लाभ हो रहा था। यह पता चलते ही उसे नौकरी से निकाल दिया गया। उसने फिर जी. डी सर्ल एंड कम्पनी में पी. आर मैनेजर का पद संभाल लिया। हालांकि उसके बाद यह शुगर फ्री सिंड्रोम इतना बढ़ता चला गया कि इसे मनुष्य के लिए इस्तेमाल से रोका ही नहीं जा सका, इसे रोकने के लिए बहुत प्रयत्न भी किए गए परन्तु कोई भी प्रयत्न कारगर नहीं रहा। आप मधुमेह के रोगी को तो भूल ही जाएं,यदि कोई सेहतमंद व्यक्ति भी शुगर फ्री उत्पाद किस्म के उत्पादों को कुछ माह के लिए प्रयोग में लाता हैं, तो वह मधुमेह से ग्रस्त हो सकता हैं। शुगर फ्री उत्पाद तो पारंपरिक रिफाइंड चीनी से भी कहीं अधिक नुकसानदायक हैं। इस बिंदु पर हमें समझना चाहिए कि रिफाइंड चीनी, नमक, तेल आदि सामग्री से बने बिस्कुट, चिप्स या डिब्बाबंद भोज्य पदार्थ हमारे लिए हानिकारक क्यों होते हैं ? मान लेते हैं कि आप चाय के साथ चीनी ले रहे हैं,

अब इस चीनी को अवशोषित व मेटाबोलाइज करने के लिए शरीर को क्रोमियम, मैगनीज, कोबाल्ट, जिंक व मैग्नीशियम की आवश्यकता होगी, जो कि चीनी को रिफाइंड करने की प्रक्रिया में समाप्त हो गए थे। इसका मतलब हैं कि ऊर्जा पाने के लिए चीनी को अवशोषित व प्रयुक्त करने के लिए शरीर को अपने खनिज भंडार में से पूर्ति करनी होगी। परन्तु यह भंडार तो पहले से ही समाप्त हो रहा हैं, क्योंकि आप पहले से ही बहुत से रोगों के ग्रस्त होंगे, जिनमें ह्रदयरोग व उच्च रक्तचाप आदि भी शामिल हैं। शरीर में विभिन्न प्रकार के विटामिनों व खनिज लवणों की कमी के कारण कई तरह के लक्षण पैदा हो सकते हैं जैसे – रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी होना, लगातार थकान रहना, शरीर में दर्द रहना, लगातार खांसी व जुखाम रहना, वजन घटना या मोटापा, जिनकी वजह से आपको मजबूरन स्थानीय डॉक्टर के पास जाना होगा। डॉक्टर आपके शरीर में घट रहे विटामिनों व खनिज पदार्थो की कमी को पहचान कर कुछ मल्टीविटामिन गोलियां भी दे सकता हैं परन्तु मल्टीविटामिन गोलियों के सेवन का तन्त्र भी अपने-आप में ही गलत हैं। मान लेते हैं की आपको विटामिन सी की कमी को पूरा करने के लिए विटामिन सी की गोलियां दी रही हैं। परन्तु फ्लो चार्ट को देख कर आप जान सकते हैं कि, जब आप गोली के रूप में विटामिन सी लेते हैं तो क्या होता हैं। विटामिन सी की अधिक मात्रा लेना – कोपर की कमी -आयरन विषाक्तता – विटामिन बी 1, विटामिन 2, विटामिन बी 6, विटामिन ई का कम अवशोषण व उपयोग- शरीर की बायो-कैमिस्ट्री में असंतुलन यह कारण हैं कि आपको कभी भी प्रकृति में ऐसा फल या सब्जी नहीं मिलेगी, जिसमें केवल एक ही तरह का विटामिन या खनिज पदार्थ पाया जाता हो। अगर आप विटामिन सी के अलावा सेब की बात करें। तो एक सौ ग्राम के एक औसत सेब में निम्नलिखित पोषक तत्व पाए जाते हैं। फलेवनोयड्स 14 -36 एम जी फास्फोरस 14.2 एम जी, बायोटीन 0.95ग्रा. पोटेशियम 109.7 एम जी ऊर्जा 48.5 कैलोरी, जिंक 0. 06 एमजी विटामिन ए (आर ई) 3.0ग्रा. ए-केरोटीन 0.1ग्रा, विटामिन ई 0.45 एमजी ,कोपर 0.03 एम,प्रोटीन 0.3ग्रा. कार्ब 10.7ग्रा. विटामिन के 3.3ग्रा. अनसैचुरेटिड वसा 0.09 ग्रा., मैगनीज 0.05 एमज, फ्लुराइड 0.01 एम जी चीनी 10.2ग्रा सुक्रोस 236ग्रा,मोनो असैचूरेटिड वसा 0.009ग्राम, पोली अनसैचुरेटिड वसा 0. 08ग्रा सेर्लेनियम 0.16ग्रा, क्रोनियम 0.76ग्रा ,ग्लूकोज 2.07ग्रा, फ्रुक्टोस 5.83ग्रा., ट्रांस वसा 0 ,कोलेस्ट्रोल 0, मेलिबडेनम 0.1ग्रा,आयोडीन 0.5ग्रा वसा 0.23ग्रा, कुछ डायटरी रेशा 2.16ग्रा, बी-केरोटीन 13.6ग्रा, बी-क्रिप्टोजेनथिन 12.4 ग्रा, विटामिन बी 1 0. 02 एमजी, पैंटोथिनिक एसिड 0.04 एमजी, स्टार्च 0.06ग्रा, क्लोराइड 0.3 एम जी, फाइटोस्टिरोल्स 15.3 एम जी, पानी 84.3 मिली, विटामिन बी6 0.05 एमजी,फोलेट 2.78ग्रा, कैल्शियम 5.0 एम जी, आयरन 0.17 एमजी, पैक्टिन 0.5 एम जी, मैगनीशियम 4.6 एम जी, कोलाइल 26.एम जी, आप पायेंगे कि सभी पोषक तत्व एक संतुलन में इस तरह पिरोए गए हैं कि जब आप एक पूरा सेब खाते हैं तो वे उसी संतुलन के साथ शरीर द्वारा अवशोषित व प्रयुक्त होते हैं और इस तरह शरीर में होमियोस्टेसिक्स में भी कोई बाधा नहीं आती। फलों या सब्जियों में पोषक तत्वों का यह संतुलन पाना, केवल प्रकृति के ही वश की बात हैं। मनुष्य ऐसी संरचना तैयार करने के बारे में सोच तक नहीं सकता। संपूर्ण खाद्य पूरक में प्राकृतिक तौर पर चार ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जिनका विश्लेषण अधिकतर रसायनज्ञों ने नहीं किया हैं हारमोंस, ऑक्सीजन, फाइटो केमीकल्स व एंजाइम। यहाँ मुझे इनके लिए बंद छतरी वाली उपमा उपयुक्त लगती हैं। फलों व सब्जियों की (पकाने या प्रोसेसिंग से पहले) तुलना एक खुली हुई छतरी से की जा सकती हैं और आपकी कोशिकाओं में जाने के बाद फिर से खुल कर सक्रिय हो जाती हैं। हालांकि जब फलों व सब्जियों से निकले पोषक तत्वों की गोली/पाउडर या टॉनिक में बदला जाता हैं तो यह अपना आकार बदलने की योग्यता खो देते हैं और एक खुली हुई छतरी के समान ही रह जाते हैं। वे दिखने में भले ही मूल पोषक तत्वों जैसे हों, परन्तु वे शरीर द्वारा उस रूप में अवशोषित नहीं हो पाते। शरीर के भीतर पोषक तत्व पाचन अवशोषण आवागमन अंगों में विवरण बायोकैमिकल पथ भंडारण मल विसर्जन जब ही हम पोषक तत्व ग्रहण करते हैं तो सबसे पहले इसका पाचन होता हैं। पाचन के दौरान, आंतडियों में उस पोषक पदार्थ का कितना पाचन हो रहा हैं, उसकी मात्रा हमेशा अलग-अलग पाई जाती हैं। किसी खाद्य पदार्थ का कोई पोषक तत्व किस सीमा तक पाचन की प्रक्रिया में आएगा व अवशोषित होगा, यह प्रतिशत अलग-अलग होता हैं कुछ मामलों में यह जीरो प्रतिशत से ले कर तीस, चालीस या पचास प्रतिशत तक जा सकता हैं। तो इस प्रकार पोषक तत्व के पाचन में काफी अंतर पाया जाता हैं। फिर यह आँतों की दीवारों के अवशोषित होता हैं। और यहाँ भी हम उस तन्त्र के बारे में जानते हैं,जो आंतो की दीवारों के पार जाने वाले पोषक तत्व के प्रतिशत को नियंत्रित करता हैं। यही रक्तधारा में प्रवाहित होता हैं। इनमें से बहुत सी बातें विस्तार से प्रकाशित हो चुकी हैं, कई वर्षो से उन पर परिक्षण होते आ रहें हैं या यह भी कह सकते हैं कि ऐसा कई दशको से होता आ रहा हैं।

यह एक जटिल प्रक्रिया हैं। परन्तु शरीर हमेशा, समय के किसी भी बिंदु पर यह तय करने में सक्षम होता था कि पोषक पदार्थ के जिस हिस्से का पाचन हुआ हैं, उसमें से कितना सही मायनों में अवशोषित हुआ हैं। अब हमारे पास विविधता के दो स्तर हैं। पहला वह प्रतिशत, जिसका पाचन हुआ हैं। दूसरा, वह प्रतिशत, जो सही मायनों में अवशोषित हुआ हैं और उसी पाचन हुए प्रतिशत का ही अंश मात्र हैं। प्रतिशत का यह प्रतिशत विभिन्न कारकों पर निर्भर होने के कारण अलग-अलग हो सकता हैं। खासतौर पर उन कारकों का नाम ले सकते हैं, जो तत्काल वातावरण जैसे पी एच या अन्य भौतिक- रसायनिक कारणों से प्रभावित हो सकते हैं। अब यह रक्त में घुल गया हैं और रक्त इसे शरीर के विभिन्न अंगो में ले जा रहा हैं। और उनमें से कुछ पोषक तत्व, विशेष रूप से लिपिड घुलनशील पोषक, जो अब शरीर की छोटी रक्त वाहिकाओं द्वारा एक स्थान पर ले जाती हैं- हो सकता हैं कि वे प्रोटीन वाहिकाएं हों। एक उदाहरण के लिए हम एलडीएल प्रोटीन अंशो की बात करते हैं जो कि बीटी केरोटीन को ले जाने का कार्य करते हैं। किसी बिंदु पर बीटी कोरोटिन की गतिविधि कितनी होगी यह इस बात पर निर्भर करता हैं कि उसकी कितनी मात्रा प्रोटीन अंशो के साथ जुड़ी हैं तथा कितनी मात्रा रक्त में घुली हैं। एलडीएल अंशो के साथ जुड़ी बीटी केरोटिन की मात्रा निष्क्रिय रहती हैं इसलिए जो मात्रा रक्त में मुक्त रूप से प्रवाहित रहती हैं, उसे ही सक्रिय माना जाता हैं। शरीर में एलडीएल तथा रक्त से जुड़ी बीटी केरोटीन की मात्रा भिन्न- भिन्न हो सकती हैं। और इस प्रकार हम देख सकते हैं कि भोजन में उपस्थित पोषक पदार्थो से संबंधित उपयोगिता, पाचन व मेटाबाँल्जिम के कई स्तरों पर घट सकती हैं। प्रत्येक अवस्था में,अगले स्तर पर जाने वाले पोषक पदार्थो का प्रतिशत हर बार समायोजित होता हैं।

इस तरह अब हम दूसरी प्रक्रिया के बारे में सोच सकते हैं, ताकि हम जान सकें कि पोषक का कितना अंश शरीर के विभिन्न अंगो को मिल रहा हैं। हो सकता हैं कि यह लीवर, पैंक्रियाज या फेफड़ों वगैरह में जाना चाहता हो तो शरीर स्वयं यह तय करता हैं और इसके लिए अपने ही जटिल उपाय प्रयोग में लाता हैं कि विभिन्न अंगो को उस पोषक का कितना भाग मिलना चाहिए। यह प्रतिशत भी पूरी तरह से अलग-अलग हो सकता हैं। यदि आप पाचन से ले कर अंगो के विवरण तक आने वाले इस परिवर्तन पर गौर करें तो इसकी उस परिवर्तन से तो तुलना ही नहीं की जा सकती जो कोशिका के भीतर जाने पर होता हैं और फिर विविध कार्यो के मेटाबाँलिज्म में काम आता हैं। ये बहुत ही जटिल बायोकैमिकल पथ हैं, जो विभिन्न पोषकों के लिए बने हैं, इन्हें इसी रूप में बनाया गया हैं ताकि पोषक तत्व को वहीं भेजा जा सके, जहां सही मायनों में उसकी आवश्यकता हैं। हो सकता हैं कि उन्हें किसी स्थान पर भंडारण के लिए भेजा जा रहा हो। हो सकता हैं कि वे निष्क्रिय या विषाक्त हो कर उत्सर्जन तन्त्र से बाहर आ जाएँ। यह बहुत तेजी से परिवर्तित होने वाली प्रक्रिया हैं जो एक माइक्रोसैकिंड में ही बदल जाती हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि आप एक बार में विटामिन सी की 100 मिली ग्रा खुराक लेते हैं और दूसरी बार में 400 मिली खुराक लेते हैं।

क्या इसका अर्थ होगा कि आपके शरीर ने पहले की तुलना में दूसरी बार चार गुना विटामिन सी की खुराक ले ली हैं। निश्चित रूप से ऐसा नहीं हैं। यह पता लगाना असंभव हैं कि आपका शरीर किसी ख़ास मल्टीविटामिन गोली को लेने के बाद उसका कितना प्रतिशत ग्रहण करेगा। इसे और अधिक समझने के लिए 1999 के नोबल पुरूस्कार विजेता डॉ. गुंटुर ब्लोबल के शोध कार्य पर नजर डालें, उन्होंने पाया कि प्रोटीन में वे आंतरिक सूचक देखे जा सकते हैं जो तय करते हैं कि कौन सी कोशिका उन्हें आकर्षित व अवशोषित करेगी और कोशिका में प्रोटीन किस जगह से संबंध रखते हैं। प्रोटीन के विषय में इस पोस्ट ने इंटरसैलूलर केमिकल शोध के लिए द्वार खोल दिए, जिसने हमें वह सिद्धांत दिया कि जिसमें सिंथेटिक व प्राकृतिक पोषक तत्वों के मसलों के लिए नियम दिए गए हैं। पोषक तत्व शरीर में यूं ही घूमते नहीं रहते कि जिस कोशिका में किसी पोषक तत्व की कमी हैं, तो वे उसे पूरा कर दें। इसकी बजाए आप मान सकते हैं कि पोषक तत्वों के पास पते व जिप कोड होते हैं, जो उन्हें उनके पते वाली कोशिकाओं तक पहुंचने में सहायक होते हैं। यह शरीर के भीतर का प्राकृतिक पोस्टल तन्त्र हैं और प्रयोगशालाओं में तैयार किए गए सिंथेटिक पोषक तत्व इस तन्त्र की सादगी व प्रभावोत्पादकता का मुकाबला नहीं कर सकते। यही वह तन्त्र हैं जो हमें यह समझने में मदद करता हैं कि क्यों फलों व सब्जियों के पोषक तत्व सिंथेटिक पोषक तत्वों की तुलना में अधिक अवशोषित होने वाले तथा जैव- उपलब्ध होते हैं। यही कारण हैं कि जब फलों व सब्जियों में मौजूद बीटी केरोटीन को कच्चे रूप में लिया जाता हैं तो यह फेफड़ों के कैंसर से बढ़ावा देता हैं। दूसरे पोषक तत्वों के लिए भी यही सच हैं। जैसे कोपर को कच्ची सब्जी के एक भाग के रूप में लिया जाए तो यह कोलेस्ट्रोल के स्तर को घटाता हैं। जबकि इसे सप्लीमेंट या सिंथेटिक रूप में लिया जाता हैं तो इससे मृत्यु दर 5.9 प्रतिशत तक बढ़ जाती हैं। (बीबीसी- 2003) सभी तरह के बेबी फूड व मिल्क पाउडर इसी सप्लीमेंट श्रेणी में आते हैं। चाइना स्टडी के अनुसार: चाइना स्टडी (1970-2006) जिन शिशुओं को इंफेट फार्मूला दूध दिया गया इम्यून तन्त्र ने इंफेट फार्मूला दूध के प्रोटीन अंश व पैंक्रियाटिक कोशिकाओं में अंतर की योग्यता खो दी ऑटो इम्यून रोग टाइप 1 मधुमेह मार्च 2012 में, भारत के उच्च न्यायलय ने बोर्नवीटा, हार्लिक्स, माल्टोवा माइलो, बूस्ट पैडिश्योर,एच आर प्रो, मैक्सी न्यूट्रीशन,(प्रोटीन मिल्क) आदि के नाम एक नोटिस जारी किया गया जिसमें उन पर भ्रामक विज्ञापन देने का आरोप लगाया गया था।

ठीक इसी तरह, एफ.डी.ए. (यू.एस.ए) ने भी न्युट्रालाईट पर पाबंदी लगाई हैं कि वह झूठे व भ्रामक दावे न करे। अब तक आप पर्याप्त प्रमाण देख चुके हैं कि न्यूट्रीशनल मल्टी विटामिन गोलियों, टॉनिक, हेल्थ व प्रोटीन पाउडर आदि व्यर्थ हैं तथा आपके स्वास्थ्य के लिए गंभीर रूप से घातक हैं। परन्तु आप लम्बे समय से यही मानते आए हैं कि न्यूट्रीशनल मल्टी विटामिन की गोलियां व सप्लीमेंट पाउडर लेने से सेहत को लाभ होता हैं और यही धारणा आपको इन वैज्ञानिक साक्ष्यों को स्वीकार नहीं करने देती। न्यूट्रीशनल मल्टीविटामिन सप्लीमेंट, हेल्थ टॉनिक, प्रोटीन पाउडर तथा दुग्ध उत्पाद लेने से पहले एक बार इस उदाहरण पर भी गौर कर लें। यहाँ आ कर आप भी भ्रम में पड़ गये होंगे कि आपने तो कई स्थानों पर नामी पत्रिकाओं में पढ़ा हैं कि न्यूट्रीशनल मल्टीविटामिन सप्लीमेंट लेने से सेहत अच्छी होती हैं और ये सेहत बढ़ाने के लिए एक अच्छा विकल्प हैं, इससे शरीर में पोषक तत्वों की कमी पूरी होती हैं तो अब किस पर भरोसा किया जाए ? इस पोस्ट में दी गई न्यूट्रीशनल मल्टीविटामिन सप्लीमेंट्स की जानकारी पर या आपकी लम्बे समय से चली आ रही मान्यता पर – इनमें से किस पर भरोसा किया जाए।
उत्तर हैं ‘कोक्रेन रिपोर्ट’ (सभी रिपोर्टो व पत्रिकाओं में सर्वश्रेष्ठ व प्रमाणिक मानी जाने वाली यह रिपोर्ट सभी रिपोर्टो से सार ग्रहण करने के बाद अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करती हैं।) कोक्रेन विश्व स्वास्थ्य संगठन की मान्यता प्राप्त संस्था हैं और भारत सहित (वेल्लोर) सौ से अधिक में इनकी शाखाएं हैं। ये लोग किसी एक विषय से जुड़ी विविध रिपोर्टे एकत्र करते हैं और परिणामों के लिए अंतिम विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। 2012 में कोक्रेन ने एक रिपोर्ट जारी की जिसमें यह आंकड़े एकत्र किए थे कि ‘फूड सप्लीमेंट हमारी सेहत के लिए अच्छे हैं या बुरे ?’
कोक्रेन सारांश – स्वास्थ्य की देखरेख संबंधी निर्णय के लिए स्वतंत्र उच्च- गुणवत्ता का प्रमाण स्वस्थ व्यक्तियों तथा विभिन्न रोगों से ग्रस्त रोगियों में मृत्युदर को घटाने के लिए एंटीऑक्सीडेंट सप्लीमेंट ज्लेकोविक जी, निकोलोवा डी, ग्लुड एलएल, सिमोनेट्टी आर जी, ग्लुड सी, ऑनलाइन प्रकाशित मार्च 14, 2012 वर्तमान पद्दतिबद्ध

रिव्यू में 78 क्लीनिकल अलग – अलग समय पर हुए परिक्षण शामिल हैं। कुल मिला कर 296, 707 भागीदारियों को एंटीऑक्सीडेंट सप्लीमेंट (बीटा केरोटीन, विटामिन ए, विटामिन सी, विटामिन ई तथा सेलेनियम) बनाम प्लेसबो यानी केवल नाममात्र के लिए कुछ दिया गया। 26 परिक्षणों में 215,900 स्वस्थ भागीदार शामिल किए गए। 52 परीक्षणों में, विविध रोगों से ग्रस्त 80, 807 रोगी शामिल किए गए, जिनके रोग स्थिर अवस्था में थे जैसे गैस्ट्रोइंटेस्टाइन रोग, ह्रदय व स्नायु संबंधी रोग, त्वचा संबंधी रोग, गुर्दे संबंधी रोग तथा ऐसे रोग जिनकी पहचान नहीं हो सकी। 183,749 भागीदारों में से 21,484 को अलग- अलग क्रम में, प्लेसबो दिए गए। इन परिक्षणों से निष्कर्ष यह निकले कि एंटीऑक्सीडेंट ने विशेष रूप से कोई भूमिका अदा नहीं की थी। उसने मृत्यु दर को घटाने के लिए खासतौर पर कोई विशेष परिणाम नहीं दिखाए थे इन प्रमाणों के आधार पर कहा जा सकता हैं कि आप जनता या विभिन्न रोगों से ग्रस्त रोगियों को एंटीऑक्सीडेंट का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ये मृत्यु दर को घटाने की अपेक्षा उसे बढ़ाने में ही अधिक सहयोगी पाए गए हैं।

निष्कर्ष- एक भारतीय नागरिक होने के नाते,चिंता का विषय यह हैं कि हमारे पास इस बात के अकाट्य प्रमाण मौजूद हैं कि पोषक या न्यूट्रीशनल
सप्लीमेंट्स बिलकुल व्यर्थ हैं और ये सेहत को बढ़ावा देने की बजाए, दीर्घकाल में कैंसर व ह्रदय रोगों जैसे रोगों को जन्म देते हैं। यह जानने के बावजूद भारत सरकार स्कूलों में आयरन व फोलिक एसिड के सप्लीमेंट बांट रही हैं (आप राष्ट्रीय समाचार पत्रों में पूरे पृष्ट का विज्ञापन देख सकते हैं) बच्चों को उन्हें खाने के लिए विवश किया जा रहा हैं जबकि वे इन्हें लेने के बाद पेट में दर्द, उल्टी, जी मिचलाना जैसी तत्काल दुष्प्रभावों के बारे में बताते हैं। पूरे देश में हजारों बच्चों को अस्पतालों में भर्ती कराने की नौबत आ रही हैं। इसके अलावा उनकी गिनती आने वाले समय में कैंसर व ह्रदय रोगियों में होगी। जबकि स्कूली छात्रों में आयरन व फोलिक एसिड की कमी को, सप्ताह में एक बार पालक या चुकंदर का एक गिलास जूस दे कर भी पूरी की जा सकती हैं। यह कहीं सस्ता व दुष्प्रभावों से रहित उपाय होगा यह सब एक षड्यंत्र (भावी पीढ़ी को पूरी तरह से अपंग, अपाहिज व दवाओं पर निर्भर बनाना) तथा मुनाफा कमाने के उददेश्य से किया गया प्रपंच हैं। अत: अंत में मेरा यही कहना है आप आप इस तरह की चीजों से बचकर रहें और स्वस्थ रहे। धन्यवाद

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