मन के विज्ञान का स्वास्थ्य (Science of mind health) पर प्रभाव

19
Science of mind health

मन के विज्ञान का स्वास्थ्य (Science of mind health) पर प्रभाव इस पोस्ट में हम आपको बताना चाहते हैं कुछ कि हमारे ह्रदय रोग विशेषज्ञों से क्या भूल हो रही है ? वे अपने उपचार के दौरान ऐसा कौन सा चरण भूल जाते हैं,

जिसके कुछ समय बाद ही रोग अपनी पूरी विकरालता के साथ सामने आ जाता हैं। दरअसल वे हमारे शरीर का उपचार तो कर देते हैं परन्तु यह भूल जाते हैं कि शरीर के साथ-साथ हमारे मन का भी उपचार होना चाहिए। केवल शारीरिक रोगों अथवा लक्षणों के उपचार से ही शरीर को पूरी तरह से आरोग्य नहीं मिल पाता। यहाँ हमारे हार्ट व ब्रेन का सामंजस्य भी बहुत महत्व रखता हैं। यदि शरीर को पूरी तरह से स्वस्थ रखना हैं तो मन को स्वस्थ रखने पर ध्यान केन्द्रित करना ही होगा। किसी भी रोग के उपचार में दवा केवल एक अंश हैं, हमारा मन व मष्तिष्क भी अपनी-अपनी भूमिकाएं निभाते हैं।

हमारा मष्तिष्क किसी बात पर कैसे विश्वास करता हैं, इसके लिए हम आपको एक उदाहरण देंगे। जैसे कई लोगों को कोक्रोच से बहुत डर लगता हैं। यद्यपि वे जानते हैं कि इस जीव में उन्हें कोई हानि नहीं हो सकती पर फिर भी वे इसे देखते ही चिल्लाने लगते हैं। वे लोग उससे भयभीत क्यों होते हैं। यदि उनसे यह पूछा जाए तो वे इसके लिए कोई जायज कारण नहीं दे पायेंगे। दरअसल इसका संबंध हमारे दिमाग में बने मानसिक चित्र से होता हैं। जब कोई बच्चा पहली बार कोक्रोज को देखता हैं तो उसके मन में कोक्रोज के लिए न तो कोई भय होता हैं और न ही किसी तरह का लगाव होता हैं। उसे उससे दूर रखने के लिए माता-पिता यूं ही कह देते हैं ”पीछे हो जाओ, ये तो भूत हैं।” अब उस बच्चे ने भूत की इतनी कहानियाँ सुनी हैं पर कभी भूत को नहीं देखा इसलिए वह यही मान लेता हैं कि वह एक भूत हैं। कुछ समय बाद जब भी कहीं भूत का नाम आता है तो उसके दिमाग में कोक्रोज का ही मानसिक चित्र उभरता हैं। इस तरह कोक्रोज और भूत का संबंध इतना मजबूत होता हैं कि उसके लिए यह भय का ही दूसरा नाम बन जाता हैं। आज इतने सालों बाद भी जब वह कोक्रोज को देखता हैं तो बस उसका दिमाग उसे उससे भयभीत होने को कहता हैं क्योंकि बचपन से ही कोक्रोज को भूत के भय से जोड़ा गया था। अब हमें यह देखना हैं कि दिमाग कैसे काम करता है। वह पहले बुद्धि से काम लेता हैं और फिर अपने स्मृति भंडार की सहायता लेता हैं जब भी दोनों में से कोई एक चुनाव करना हो तो वह बचपन में बसे मानसिक चित्र को ही मानेगा। वह किसी भी तर्क को समझने या मानने से पहले अपनी पिछली स्मृति से मदद मांगता हैं। यदि वह उस तर्क को समर्थन देती हैं तभी वह उसे मानने को तैयार होता है।

यदि हमें अपने दिमाग में कोई चीज डालनी हैं तो उससे जुड़ा कोई अनुभव डालना होगा तभी वह उस परिवर्तन को स्वीकार कर सकेगा। हम मान लेते हैं कि कोई व्यक्ति सौ मीटर की रेस में दौड़ने जा रहा हैं। अभी वह भागने की तैयारी में होता हैं। वहाँ उल्टी गिनती बोली जा रही हैं पर अभी भागना आरंभ करने से पहले ही उसके दिल की धड़कन तेज हो जाएगी। अभी जबकि उस खड़े हुए व्यक्ति को किसी तरह की चुनौती का सामना नहीं करना पड़ रहा और न ही उसे किसी तरह से ऊर्जा की आवश्यकता हैं परन्तु उसका दिल व दिमाग आपस में बातचीत कर रहे हैं। वे जानते हैं कि उक्त व्यक्ति जब भी भागने की तैयारी में होता हैं तो उसके शरीर में ये बदलाव आते हैं। यह सब उसके अभ्यास का परिणाम हैं। दिमाग उस व्यक्ति द्वारा किए गए पिछले अभ्यासों तथा अपनी संचित स्मृति के बल पर स्वयं ही यह निर्णय ले रहा हैं कि इस व्यक्ति को दौड़ में जिताना हैं। अब जब वह व्यक्ति भागने लगता हैं तो उसके दिमाग को पता होता हैं कि इस समय पाचन तन्त्र को भोजन पचाने के लिए ऊर्जा की अधिक आवश्यकता नहीं हैं इसलिए वह अधिकतर ऊर्जा को इस कार्य के लिए निर्देशित कर देगा। भागने से व्यक्ति के शरीर के तापमान में वृद्धि होगी। इसके कारण उसके शरीर तन्त्र को हानि न हो इसलिए शरीर उसकी स्वेदग्रंथियों को सक्रिय कर देगा। वह व्यक्ति जब पसीना बहाएगा तो शरीर का तापमान स्वयं ही घट जाएगा। अब वह व्यक्ति भागता ही जा रहा हैं और दिमाग भी जानता हैं कि उसे पानी की आवश्यकता होगी। सामान्यत: जब हम ज्यादा पानी पीते हैं तो हमें कुछ समय बाद मूत्र विसर्जन की इच्छा होती हैं परन्तु इस अवस्था में मष्तिष्क पहले से जानता हैं कि वह व्यक्ति कहीं नहीं रुक सकता। इस तरह वह चाहे जितना भी पानी क्यों न पी लें, उसे मूत्र विसर्जन करने की इच्छा ही नहीं होगी। उसके दिमाग में पहले से यह सब बसा है कि उसके लक्ष्य की पूर्ति के लिए कौन-कौन से साधन अथवा माध्यम सहायक हो सकते हैं। अब हमें जानना होगा कि हमारे जीवन में भावनाएं क्या महत्व रखती हैं। भावनाएं तर्क को नियंत्रित करती हैं और तर्क भावनाओं को नियंत्रित करता हैं पर भावनाएं कहीं अधिक तीव्र प्रभाव रखती हैं। हमारे विजुएल केंद्र से भावनाएं भी नियंत्रित हो जाती हैं। उसके कारण तर्क शक्ति भी प्रभावित हो जाती हैं।

स्नायु तन्त्र हार्मोन ब्रेन 1 हार्मोन प्लस वेव इलेक्ट्रोमैगनेटिक तरंगें यदि दिमाग को दिल से कुछ कहना है तो वह स्नायु तन्त्र व हार्मोनों का प्रयोग करेगा और दिल दिमाग से कुछ कहना चाहता है तो वह पल्स वेव, हार्मोनों तथा इलेक्ट्रोमैगनेटिक तरंगो की मदद लेगा। ये तरंगें इस सम्पर्क में अहम भूमिका निभाती हैं। मान लें कि आप अपने मित्र के घर जाते हैं। दरवाजा खटखटाने के थोड़ी देर बाद दरवाजा खुलता हैं। मित्र मुस्कान के साथ स्वागत करते हैं और आपको कमरे में बिठा कर कुछ लेने भीतर जाते हैं। आपके स्वागत में कोई कमी नहीं थी परन्तु फिर भी आप अपने भीतर से बेचैनी सी अनुभव करते हैं। दरअसल आपके वहाँ आने से कुछ ही क्षण पहले पति-पत्नी के बीच किसी विषय पर परस्पर कलह हो रही थी, जो दरवाजे की आहट सुन कर रोक दी गई। इस समय आप जो महसूस कर रहे हैं। वह हार्ट की इलेक्ट्रोमैगनेटिक तरंगों के कारण हो रहा हैं। वे वहाँ के वातावरण में अपना प्रभाव छोड़ रही हैं। जिसे आपके दिल ने ग्रहण कर लिया हैं। कुछ भी जाने- बूझे बिना भी आप उस वातावरण में फैली असहजता को भांप जाते हैं। आप किसी व्यक्ति से पहली बार मिलते हैं और उससे मिल कर अपनेपन का एहसास होता हैं। किसी दूसरे व्यक्ति से पहली बार मिलते हैं और उससे मिलने के बाद खुद को सहज नहीं पाते। आप कहते हैं कि वह मेरे अनुकूल नहीं हैं। दरअसल यह हार्ट द्वारा रिलीज की गई इलेक्ट्रोमैगनेटिक तरंगों का कमाल हैं। वैसे तो हमारा ब्रेन भी इलेक्ट्रोमैगनेटिक तरंगें रिलीज करता हैं परन्तु हमारे हार्ट से निकली ये तरंगें उससे लगभग 500 गुना अधिक शक्तिशाली होती हैं।

यदि हम चाहते हैं कि अपने मौखिक सम्पर्क के साथ- साथ अमौखिक सम्पर्क से भी अच्छी व सकारात्मक छाप छोड़े और सामने वाला व्यक्ति हमसे उसी रूप में पेश आए, जैसा कि हम चाहते हैं तो हमें अपने हार्ट से निकालने वाली इलेक्ट्रोमैगनेटिक तरंगों पर ध्यान देंना होगा। इन्हें नियंत्रित करना होगा।  इससे पहले यह देखें कि यह सब कैसे होता हैं ? हमें जानना होगा कि हमारी वे सामने वाले व्यक्ति की इलेक्ट्रोमैगनेटिक तरंगें परस्पर प्रभावित करती हैं। हमारे शब्दों का आदान- प्रदान तो आंशिक प्रभावही रखता हैं। इसका तात्पर्य यह हैं कि जब हम किसी से बात करते हैं तो वह निश्चित रूप से हमारे शब्दों से प्रभावित होता हैं परन्तु उस समय हमारे शारीरिक हाव-भाव तथा हमारे मन में उस व्यक्ति के प्रति चल रहे भाव तथा उनसे निकलने वाली तरंगे भी कम महत्व नहीं रखतीं। जो व्यक्ति अपने मन में सकारात्मक भाव रखता हैं। उसका मन हमेशा प्रसन्न व सकारात्मक विचारों से ओत-प्रोत रहेगा परन्तु जो व्यक्ति सदा नकारात्मक भाव रखता हैं उसके आस-पास भी एक नकारात्मक घेरा सा बन जाता हैं वह उसी मीन उलझ कर रह जाता हैं। वह अपने प्रत्येक कार्य में नकारात्मकता व निराशा तलाश लेता हैं। यहाँ हार्ट व ब्रेन का सामंजस्य कुछ ऐसा ही हैं मानो कोई बेसुरा संगीत! जब हमारे शरीर के सभी अंग एक ताल में काम करते हैं तो हम बड़ी आसानी से अपने कार्य कर पाते हैं। हमारी प्रतिभा को सामने आने में देर नहीं लगती। यदि हम इस तथ्य को समझ कर आगे चलेंगे तो बहुत से कार्य स्वयं ही सजकता से होंगे। शोध में पता चला कि अस्वस्थ भावों से निम्नलिखित परिणाम सामने आ सकते हैं।

(1) स्पष्ट रूप से चिन्तन की अयोग्यता निर्णय निर्धारण की योग्यता में कमी।
(2) शारीरिक संयोजन में कमी।
(3) ह्रदय रोग होने के खतरे में वृद्धि।
(4) उच्च रक्तचाप के खतरे में वृद्धि।
‘ह्रदय रोगों में आधे से अधिक मामलों के लिए उच्च कोलेस्ट्रोल, धुम्रपान या आरामदायक जीवनशैली जैसे कारकों को दोषी नहीं पाया जाता। ‘अचानक ही सुनने में आता हैं कि कोई स्वस्थ व्यक्ति ह्रदय रोग से चल बसा। उसके जीवन में कोई भी खतरे का कारक नहीं था। यह सब हार्ट व ब्रेन में असंगति के कारण होता हैं। इस तालमेल के अभाव में जीवन बड़ा ही सूना सा लगने लगता हैं। ऐसा लगता हैं कि यह जीवन कोई बोझ बन गया हैं। लन्दन विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार जो व्यक्ति तनावग्रस्त रहते हैं तथा नकारात्मक विचार रखते हैं उनमें दिन में दस बार सिगरेट पीने वाले व्यक्तियों की तुलना में कैंसर तथा ह्रदय रोगों से असमय मृत्यु को प्राप्त होने का खतरा छह गुना अधिक होता हैं। ‘दस वर्षीय अध्ययनों से यह परिणाम सामने आए कि धुम्रपान की तुलना में तनाव के कारण कैंसर तथा ह्रदय रोगों से होने वाली मौंतें अधिक रहीं जो व्यक्ति प्रभावी रूप से तनाव का प्रबन्धन नहीं कर सके, उनमें तनाव रहित व्यक्तियों की तुलना में 40% उच्च मृत्यु दर पाई गई।’ ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में बताया गया कि करीब दस हजार सरकारी कर्मचारियों पर एक अध्ययन किया गया। यह वे कर्मचारी थे जिनके मन में किसी भी समय नौकरी छिन जाने का भय समाया था, उनमें दूसरे व सुरक्षित पद के साथ जीने वाले कर्मचारियों की तुलना में कोरोनरी ह्रदय रोगों की दर दुगनी पाई गई। हावर्ड मेडिकल स्कूल ने ऐसे 1623 व्यक्तियों पर शोध किया, जो हार्टअटैक के बाद बच गए थे। यह पाया गया कि जब वे लोग भावनात्मक संघर्ष के दौरान गुस्से में होते थे तो दिल का दौरा पड़ने की संभावना, शांत रहने वालों की तुलना में लगभग दुगनी हो जाती थी।
हमारा जीवन क्या हैं। मन, पर्यावरण तथा शरीर के मेल से ही हमारा जीवन बना हैं। जब डॉक्टर किसी का उपचार करता हैं तो वह शरीर पर ही काम करता हैं। हमें शरीर, मन व पर्यावरण तीनों पर काम करना होगा। मान लेते हैं कि हमें कोई परीक्षा देने जाना हैं। उस समय यदि हमारे हार्ट व ब्रेन में उचित सामंजस्य करेंगे तो परीक्षा देना बहुत सहज हो जाएगा। हार्ट व ब्रेन का सामंजस्य अथवा दिल व दिमाग की संगति प्राप्त होने पर मन, शरीर व पर्यावरण का भी उचित संतुलन पा सकते हैं। संतुलन के अभाव में कोई भी कार्य पूरा नहीं हो पाता। संगति हमारे कार्य को गति प्रदान करती हैं। मनपसन्द कार्य करते समय हमारा दिल और दिमाग एक ही ताल पर धड़कते हैं। उस कार्य की परिणाम भी अच्छे ही आते हैं परन्तु ऐसा तो हमेशा संभव नहीं हो सकता कि हमें अपना प्रिय कार्य ही करने को मिले तो ऐसे में हमें क्या पहल करनी होगी ? हमें किसी भी कार्य को करने से पूर्व अपने हार्ट व ब्रेन को एक तालमेल में लाना होगा। जब कोई व्यक्ति गुस्सा करता हैं तो उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अचानक तेजी से बढ़ती हैं और फिर एकदम नीचे आ जाती हैं।
वहीं दूसरी और जब कोई देखरेख करने वाला हो या प्यार करने वाला हो तो उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता थोड़ी बढ़ती हैं, थोड़ी घटती हैं और धीरे-धीरे बढ़ने लगती हैं। इससे साफ हैं कि हमारी इम्युनिटी भी हर बीट व सोच के साथ बदलती हैं। यहाँ भी सब हार्ट व ब्रेन की संगति ही निर्भर करता हैं। आप उन इलेक्ट्रोमैगनेटिक तरंगों के बारे में जान ही चुके हैं जो हार्ट से रिलीज होती हैं। उन्हीं तरंगों के माध्यम इलेक्ट्रोमैगनेटिक क्षेत्र तैयार होता हैं। जिस तरह दो चुंबकों के बीच एक चुंबकीय बल व आकर्षण पाया जाता हैं। उसी प्रकार दो व्यक्तियों के बीच भी इलेक्ट्रोमैगनेटिक क्षेत्र होता हैं। मान लें कि आप जाने-माने व्यक्ति से भेंट के लिए जाते हैं परन्तु उससे मिलने के पश्चात आपको यही लगता हैं कि उसके स्वभाव में कहीं कोई कमी सी थी। वह उतनी अच्छी तरह से पेश नहीं आया जितना कि उसे आना चाहिए था। अब इस बात के मूल में जाएँ तो यहाँ आपका भी दोष गिनाया जा सकता हैं। जब आपने उसके ऑफिस में कदम रखा तो आप उसके व्यवहार के विषय में आश्वस्त नहीं रहे थे। आपके हार्ट से जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें निकलीं, उनके कारण उसने स्वयं को व्याकुल अनुभव किया और आपके साथ उस तरह पेश नहीं आ सका, उतनी अच्छी तरह से पेश नहीं आ सकता, जितना कि वह आ सकता था। फरवरी 1996 के न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडीसन का उदाहरण लिया जा सकता हैं। जिसमें यह बताया गया था कि लोंस एंजेल्स में, नार्थब्रिज भूकंप से सुरक्षित रहे परन्तु उनके हार्ट अपने आसपास हो रही मौतों की वारदातों से प्रभावित हुए। ‘पहले खाड़ी युद्ध के दौरान, इजरायली अस्पतालों में दिल के दौरों से मरने वालों की संख्या में अचानक तेजी आ गई।’ न्यूयार्क शहर में 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमलों में पिटीएसडी (पोस्टट्रोमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) के कारण बहुत से लोगों की जानें गई।’
मृतकों में वे लोग शामिल थे जिन पर हमले का कोई प्रभाव नहीं हुआ और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य को हानि हुई परन्तु वे उस घटना के साक्षी थे उस घटना की भयावहता ने ही उन्हें तनावग्रस्त किया और मौत के मुहँ तक पहुंचा दिया। हमारे नकारात्मक भावों के कारण दिल व दिमाग का आपसी सामंजस्य बिगड़ जाता है और बहाव सकारात्मक होने पर दिल व दिमाग के बीच सामंजस्य स्थापित होता हैं। यदि हम इन दोनों के बीच अंतर जानना चाहें
तो सकारात्मक भाव नकारात्मक भाव दिल व दिमाग का सामंजस्य दिल व दिमाग में सामंजस्य का अभाव –

सकारात्मक भाव- Science of mind health(1) ऑक्सीटासिन उत्पादन (लव हार्मोन) में वृद्धि
(2) सफेद रक्तकणों के उत्पादन में वृद्धि
(3) कोलोन का खाली होना
(4) मूत्राशय का खाली होना
(5) शरीर में उर्जा के प्रवाह में वृद्धि
(6) पाचक रसों के स्राव में वृद्धि
(7) मुहँ में लार बनना।

नकारात्मक भाव
(1) कोर्टिसोल उत्पादन (तनाव हार्मोन) में वृद्धि
(2) सफेद रक्तकणों के उत्पादन में कमी
(3) कोलोन का साफ न होना
(4) मूत्राशय को खाली होने में समय लगना
(5) शरीर में उर्जा के प्रवाह में कमी
(6) पाचक रसों के स्राव में कमी
(7) मुहँ की लार का सूखना।

मष्तिष्क की सोच – हमारा दिमाग अक्सर हमें वही दिखाता हैं। जो हम देखना चाहते हैं। हम किसी भी काम की शुरुआत से पहले उस काम के बारे में एक राय बना लेते हैं जो हमारे पिछले अनुभवों पर आधारित होती हैं। इसके बाद हमारा सारा कार्य उसी सोच पर टिक जाता हैं। हमारा मष्तिष्क सदैव अपने पिछले अनुभवों को काम में लाता हैं। जैसे जब किसी रोगी का हाथ काट दिया जाता हैं तो वह सर्जरी के कुछ समय बाद भी उस काटे गए अंग में खुजली होने की शिकायत करता हैं। इसे प्राय: मनोवैज्ञानिक समस्या माना जाता है परन्तु इसमें हमारे दिमाग का भी हाथ होता हैं। अभी रोगी के दिमाग ने इस तथ्य को नहीं स्वीकारा हैं कि कोई अंग कट गया हैं इसलिए वह उसमें खुजली करने की इच्छा पैदा करके, अपने-आप को आश्वस्त करना चाहता हैं कि अंग शरीर के साथ ही हैं। वह अपने पिछले अनुभवों के द्वारा ऐसी संवेदनाएं पैदा करता ही रहता हैं। हमारा हार्ट पूरे शरीर में रक्त संचरण को सुचारू बनाए रखता हैं। ईश्वर ने इस मशीन को चालू रखने के लिए कुछ छिपी आर्टरीज भी दी जिसे कोलेस्ट्रोल आर्टरी के नाम से जाना जाता हैं। जब हार्ट की असली आर्टरी काम करना बंद कर देती हैं। तो ब्रेन व हार्ट मिल कर इन छिपी आर्टरीज की मदद से काम कर सकते हैं। इसे समझने के लिए ऐसी गाड़ी की
मिसाल लें जिसमें एक स्टेपनी लगी हैं। यदि गाड़ी पंचर हो जाए तो स्टेपनी की मदद लें सकते हैं पर उसे लगाने के लिए कोई न कोई साधन चाहिए और गाड़ी को रोकना भी होगा ताकि स्टेपनी को बदला जा सके। हम ऐसा नहीं कर सकते कि चलती गाडी में पंचर पहिया बदल दें। उसी तरह ब्रेन व हार्ट में आपसी तालमेल बनना होगा ताकि हार्ट की छिपी आर्टरी वक्त पड़ने पर अपना काम कर सके। हमारे भारत में डेढ़ करोड़ से भी अधिक ह्रदय रोगी हैं। पूरी दुनिया के ह्रदयरोगियों में से साठ प्रतिशत तो भारतीय ही हैं। बाकी चालीस प्रतिशत पूरी दुनिया से हैं। पूरी दुनिया में एक तिहाई मौतें दिल के रोगों के कारण ही होती हैं। ब्रेन के पास यह विकल्प होता हैं कि वह कोलेट्रल आर्टरी से काम करवा सके परन्तु यह तभी संभव हैं जब दिल व दिमाग की संगति सौ प्रतिशत हो। यह कोई कल्पना या धारणा नहीं हैं। हम वास्तव में, दो दिन के भीतर अपने दिमाग द्वारा यह परिवर्तन ला सकते हैं। हम अपने हार्ट की इन आर्टरीज को देख सकते हैं परन्तु इसे प्रयोग में नहीं ला पाते। इसे प्रयोग में लाने के लिए जो तकनीक अपनानी होगी। उसका हमारे दिल और दिमाग से गहरा संबंध हैं। कई बार ऐसा होता हैं कि हम आपातकाल में अपने दिल और दिमाग का बेहतर सामंजस्य पा कर बहुत अच्छे परिणाम पा लेते हैं। आप
उस कटे अंग में खुजली वाली घटना को स्मरण करें। जब रोगी बार-बार उस कटे अंग में होने वाली खुजली की बात करता है तो यहाँ डॉक्टर दिमाग के पिछले अनुभव तथा स्मृति का ही आश्रय लेते हैं। वे रोगी से कहते हैं कि वह आँखे बंद करके, कल्पना करें कि वह अपने एक हाथ से उस अंग में खुजली कर रहा हैं,जिसे काटा गया था। रोगी अपनी कल्पना में उस अंग को अच्छी तरह खुजला लेता हैं और उसके बाद उसके मन को तसल्ली मिल जाती हैं। हमारे ये उदाहरण दर्शाते हैं कि मनुष्य केवल कोई शरीर नहीं है इसलिए किसी भी रोग में केवल शरीर को दवा देने से बात नहीं बनती। हमें शरीर से परे जा कर दिल और दिमाग को भी दुरुस्त करना होगा। बड़े आश्चर्य की बात यह हैं कि शरीर व मन के इस संबंध की शिक्षा मेडीसन (डॉक्टर) की पढ़ाई में नहीं दी जाती। उनके पाठ्यक्रम में इन बातों के लिए कोई स्थान नहीं हैं।

⇒एक बार जान लो तो जिन्दगी भर हार्ट अटैक से बचे रहोगे | Watch Now and Never Get Heart Attack in Life.⇐click करें