व्रत और उपवास का यह 6 वैज्ञानिक (Scientist of fasting and fasting) महत्व

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Scientist of fasting and fasting
व्रत और उपवास का वैज्ञानिक (Scientist of fasting and fasting) महत्व। हमारे ऋषि-मुनियों ने अपने अनुभव से यह अच्छी तरह जान लिया था कि अन्न का नियमित उपयोग स्वास्थ्यपूर्ण नहीं है
उपवास रखना वैसे तो एक आस्था हैं अलग -अलग धर्मो के लोग अपनी- अपनी धार्मिक आस्थाओं और मान्यता के अनुसार ईश्वर की आराधना करते हैं व्रत की आड़ में हम श्रद्धा भाव रखते हैं और पूजा आराधना करते हैं। जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभकारी होता हैं। पाचन तन्त्र को थोड़ा आराम मिलने से शारीरिक प्रणालीयां संतुलित हो जाती हैं। मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता हैं इसके साथ ही फायदेमंद आहार और शारीरिक पोषण तय करने की संबंधी जानकारी मिलती हैं। अन्न सुस्ती, भारीपन,पैदा करता हैं 
यह नशीला आहार हैं लेकिन ऐसे तो हम अन्न नहीं छोड़ सकते इसलिए ये व्रत करने की परम्परा हुई हैं। कोई भी प्राणी उपवास करके ही अन्न त्याग कर सकता हैं ऐसे तो इस दुनिया में कोई भी प्राणी अन्न त्याग करके इस दुनिया की भीड़ से अलग नहीं जा सकता क्योंकि उसे भी इसी दुनिया की भीड़ में ही रहना हैं। आपको पूर्णतया अन्न त्यागने की आवश्यकता नहीं हैं। नियमित अन्न के उपयोग से स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं हैं, दिन में तीन बार खाते हो तो एक बार ही अन्न शामिल करें। बाकी फल या फलों का जूस लें। जिस तरह आप अन्न से धीरे-धीरे दूर होते चले जायेंगे और फलों मेवों और अंकुरित अन्न पर रहोगे आप के सारे रोग दूर हो जायेंगे। 
शरीर में जबरदस्त चमत्कारिक लाभ और हमेशा ताजगी महसूस करोगे। हमें अन्न खाने के बाद नींद ही क्यों आती हैं स्फूर्ति क्यों नहीं रहती हमारी स्फूर्ति खो जाती है आप खुद फलहार पर रहकर ये सिद्ध कर सकते हो की सिर्फ तीन महीने फलहार पर रहकर ये जान लो कि आप में ईतनी स्फूर्ति आ जायेगी कि आप से थकान तो कोसो दूर रहेगी साथ ही साथ शरीर के जितने भी छोटे हो या बड़े रोग हो गायब हो जायेंगे। यहाँ तक कि असाध्य रोग भी ठीक हो जायेंगे।
इसलिये मानव को अन्न से छुटकारा दिलाने के लिए उन्होंने ईश्वर, मोक्ष, स्वर्ग, पुण्य के बहाने व्रत उपवास की व्यवस्था की क्योंकि सीधे अन्न कम करने या छोड़ने की बात मानव समझ नहीं पाता, क्योंकि अन्न एक व्यसन है,आदत है, आषक्ति हैं छोड़ते ही शरीर में बेचेनी और कई लक्षण पैदा हो जाते है जैसे शराब और सिगरेट छोड़ने पर होते है- मानव आसानी से इससे मुक्त नहीं हो पायेगा, दृढ इच्छाशक्ति एवं कोई लालच, कोई आकर्षण, कोई भय, या धर्म के नाम पर ही वह इससे मुक्त हो सकता हैं। 
इसी कारण मौसम परिवर्तन गर्मी एवं सर्दी के हिसाब से भारत में नौ-नौ दिन की दो नवरात्रि और अन्न मुक्त उपवास की प्रथा निर्मित कर दी गई। पूरे महीने भर अलग-अलग ईश्वर देवता के साथ जोड़कर सप्ताहिक उपवास बना दिये। सारे त्यौहारों को उपवास के साथ जोड़ दिया,पूरे साल भर में हिन्दू धर्म में कम से कम 365 दिनों में 100 दिन व्रत-उपवास में बदल दिए है 
जिसमें एकादशी पूर्णिमा जैसी तिथियाँ भी है। इसके पीछे बहुत बड़ी बुद्धिमत्ता और चालाकी का प्रयोग किया गया सिर्फ मानव कल्याण के लिए, ताकि मानव अन्न से मुक्त होकर स्वास्थ्य का लाभ उठा सके। महात्मा भी ध्यान-साधनाओं में इसलिये अन्न मुक्त होकर दूध- फलहार पर रहते हैं क्योंकि अन्न शरीर में जड़ता, भारीपन, सुस्ती और नशा पैदा कर जबरदस्त बाधाएँ पैदा करता है,समय नष्ट करता है। शीघ्र अध्यात्मिक अनुभव नहीं करने देता।
 प्राकृतिक आहारी के लिए व्रत उपवास जैसे शब्द निरर्थक है क्योंकि खूब अन्न खाओं- शरीर को विषाक्त करो,अत्यधिक करो और फिर दूसरी अति में जाकर, अत्याचार से मुक्ति के लिए व्रत उपवास करो- मानव जीवन भर यही लड़ाई कभी इस अति में-कभी उस अति में करता रहता है।
 प्राकृतिक आहारी न तो शरीर को विषाक्त करता है, न अत्याचार करता है वह तो मध्य में स्थिर रहता है, इसलिये व्रत उपवास की अति में उन्हें जाने की कभी आवश्यकता नहीं पड़ती। संसार में मानव के सिवाय किसी भी प्राणी को उपवास की आवश्यकता नहीं है। नियम अनुशासन बनते ही इसलिये कि पहले गलतियाँ करों- फिर सुधार करों। सच्ची भूख लगने पर भोजन न करना हिंसा और अत्याचार हैं। 
व्रत उपवास मन नियन्त्रण एवं संकल्प शक्ति के लिए अच्छे प्रयोग है। इसका विवेक पूर्ण इस्तेमाल करें, ईश्वर को खुश करने के लिए नहीं – शरीर को खुश करने के लिए है।अन्न का नियमित उपयोग स्वास्थ्यपूर्ण नहीं है

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