बच्चों की ताजगी (Freshness of children) और स्पूर्ति का रहस्य

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Freshness of children

बच्चों की ताजगी (Freshness of children) और स्पूर्ति का रहस्य ये स्फूर्ति? बच्चों को व्यायाम नहीं करना पड़ता

बच्चों को कौन प्रेरित करता हैं दिन में 18 घंटे उछल-कूद और हल्ला करते रहने के लिए? कहा आती हैं ये स्फूर्ति? बच्चों को व्यायाम नहीं करना पड़ता उनसे व्यायाम हो जाता हैं, बच्चों को व्यायाम के लिए कहना ही पागलपन सा लगता हैं। बच्चों के व्यायाम जबरन नहीं हैं, सहज हैं, भयग्रस्त नहीं है, प्रेममय है, मस्तीपूर्व है। बचपन और जवानी की यह स्फूर्ति अत्यधिक प्रबल होने के कारण गलत आहार और वातावरण को भी अपने सर पर चढ़ने नहीं देती- इसलिए इनका दुष्प्रभाव पता नहीं चलता। हालांकि बीच-बीच में बुखार, दस्त तीव्र रोगों द्वारा शरीर सच्चाई प्रकट करता रहता है। परन्तु हम दोष कीटाणुओं पर डाल देते हैं।

जवानी के बाद यही स्फूर्ति गलत आहार के नीचे दबने लगती है। पक्षियों को कौन उड़ने के लिए मजबूर करता है? हिरन को कौन भागने के लिए कहता है? बस, बेवजह भाग रहे है, तैर रहें हैं, बन्दर छलांगें लगाये जा रहा है। हमारे बच्चें भी उछलकूद कर रहें हैं। क्यों? सब बेवजह – भीतर की स्फूर्ति इन सभी को उछाल रही हैं। इनका आहार, इनका जीवन इस स्फूर्ति में बाधक नहीं हैं। इसलिये जीवन भर ये सहज स्फूर्ति के बहाव का आनन्द लूट रहे होते हैं। हम भी हमारे आहार और जीवन में बचपन में बहती जा रही इस स्फूर्ति में अगर अवरोध पैदा न करें तो जीवन पर्यात इस स्फूर्ति के स्त्रोत बहाव का हम भरपूर आनन्द लूटते रह सकते हैं, जहाँ जानबुझकर के व्यायाम करने का कोई स्थान नहीं हैं।

घूमना, चलना, हँसना, खेलना, दौड़ना, कूदना, तैरना, उछलना, गाना, चिल्लाना, चढ़ना, उतरना, वजन ढ़ोना यही तो जीवन के सहज व्यायाम हैं, बाकी तो सारे के सारे थोपे हुए व्यायाम हैं। असहज, अस्वाभाविक व्यायाम जिन्हें एक बार अपनाकर जीवन भर घसीटते रहना पड़ता हैं। करें तो दु:खी न करें तो दु:खी। जिस व्यायाम में करने का एहसास होगा, प्रयत्न होगा उस व्यायाम में कमी आनन्द, मस्ती बहाव और सहजता नहीं होगी। उसमें सीमा होगी, तनाव होगा, गंभीरता होगी, स्वास्थ्य की चिंता होगी, अहंकार भी होगा। सहज व्यायाम में कोई करने वाला (कर्ता भाव) नहीं होगा, स्वास्थ्य की चिंता और अहंकार भी नहीं होगा, एक आनन्द,एक मस्ती, एक बहाव, एक सहजता होगी, फूल खिलने की तरह, हिरन के दौड़ने की तरह, पक्षियों के उड़ने की तरह। जब तक स्वास्थ्य और शान्ति के लिए प्रयत्न होंगे तब तक मानव रोगी और दु:खी ही रहेगा। स्वास्थ्य और शान्ति तो केवल प्रकृति के नियमों के ऊपर चलने के परिणाम है। हम अपना जीवन प्रकृति के नियमानुसार ढाल लें तो स्वास्थ्य और शान्ति ही जीवन में उतर जाती है।

प्राकृतिक आहार पर रहने पर यही सब कुछ घटता है उसमें अगर शरीर को परिश्रम विहिन निष्क्रिय होने के लिए बाध्य होना पड़ता है तो अनाज, दूध, मांसाहार की तरह वजन बढ़ने का या रोगी हो जाने का भय नहीं रखता। गलत आहार वाले की निष्क्रियता बढ़ने पर उसके गलत खाने की भूख,बार-बार खाने की रोगी भूख दुगुनी हो जाती है। प्राकृतिक आहार में उत्तेजना न होने के कारण निष्क्रियता बढ़ जाने पर भूख अपने आप बहुत कम हो जाती है, खाने की इच्छा कम हो जाती है। यहाँ तक कि 1 संतरा भी पूरे दिन में काफी हो जाता है। ऐसी निष्क्रियता में भूख के अनुसार आहार घंटो में नहीं,दिनों में लिया जाता है। शरीर अपनी जगह बिलकुल स्वस्थ और शुद्ध रहता हैं। निष्क्रियता के कारण, मांसपेशियों के उपयोग कम होने या बिलकुल न होने के कारण सिकुड़ कर दुबला-पतला अवश्य हो जाता है, परन्तु अस्वस्थ और शक्ति विहिन नहीं।

शक्ति, ऊर्जा जब चाहे हमारे आदेश पर, हमारी मांग पर मिलने को तैयार! ऐसा शरीर सामान्य लोगों से कई गुणा अधिक उम्र प्राप्त करता है। जिस अंग का हम अधिक उपयोग करते हैं चाहे वह दिमाग हो, चाहे वह हाथ या पैर, वही अंग अधिक सक्रिय और मजबूत हो जाता है। यह शरीर का किफायत करने का अपना तरीका है।
इसलिए जो भी प्राकृतिक आहारी शरीर से कम सक्रिय होंगे वह हमेशा दुबले-पतले रहेंगें। जब मांस-पेशियों का सक्रिय उपयोग नहीं हैं। तो इनके सुडौल और मजबूत होने का कोई रास्ता ही नहीं है। ये लोग दुबले-पतले होने के बावजूद भी स्वस्थ, फुर्तीले और चुस्त होते हैं। इन लोगों का रोगकारक चर्बी से भरे, या कठिन व्यायामों से पहलवान बने व्यक्तियों के साथ तुलना करना नितांत अज्ञानता हैं।
प्राकृतिक आहारी अगर अपनी सक्रियता का भरपूर उपयोग करते हैं तो उनका रोम-रोम स्फूर्ति और ऊर्जा से भर जाता हैं। इनकी मांसपेशियों का अगर ये कठिन व्यायामों के लिए उपयोग करते हैं तो वे आकार में फैलकर बड़ी और मजबूत हो जाती है। उपयोग नहीं होता है तो फिर सिकुड़ जाती है परन्तु हमें कभी रोगी नहीं बनाती। भारतीय महात्माओं ने, संतो ने इस सच्चाई को सैकड़ो बार सिद्ध किया है। ये बातें आपको असामान्य, अस्वाभाविक या अव्यवहारिक लग सकती हैं,परन्तु अपने ही खजानों की हमें जानकारी न हो पाना अपने आप में दुर्भाग्यपूर्ण हैं।
चिलचिलाती धुप और तेज गर्मी में बच्चों का ख़ास कर ध्यान रखना जरूरी हैं इसके लिए बच्चों को भरपूर मात्रा में तरल पदार्थ देना हैं क्योंकि घर के अंदर और बाहर से हर तरह की गतिविधियों से एक्टिव रह सके और इसके लिए बाहर का कुछ भी नहीं देना हैं। क्योंकि बाजार में मिलने वाली डिब्बो में बंद ड्रिंक कतेई सही नहीं आते है। आप को घर में ही उनके पसंदीदा कुछ लिक्विड बनाना है जो बच्चें पी के तरो ताजा हो जाए सबसे (best) फलों का जूस जैसे आप मौसमी का जूस, पाइनापल का जूस, गन्ने का जूस, अनार का जूस,अगर गर्मी तेज हें तो नींबू का रस उसमें थोड़ा हरा पुदीना डाल कर दे सकते हैं।जो वो गर्मी से बच सके। अगर बच्चों को पसंद नही आए तो उनके पसंद का कुछ भी फलों का रस बना सकते हैं। फलों के अलावा कुछ और नहीं देना हैं, क्योंकि हमारे हाथ में ही होती हैं बच्चों की देख-रेख जिससे वो तरो ताजा रह सके और उनमें स्फूर्ति बनी रहे बच्चों का ध्यान रखना उनके माँ-बाप की ही जिम्मेदारी होती हैं। हम जैसा रूटीन बनायेंगे उस को बच्चें अपनी आदत बना लेते हैं इसलिए बच्चों के सामने ऐसी बाते न करें जो, उनकी आदत को खराब कर, उनके भविष्य को खराब करें। उनकी नींव बचपन से ही बनती हैं उसे मजबूत बनाए इसलिए उन्हें अच्छे माहोल, अच्छी शिक्षा, और अच्छी आदते सिखायें बच्चे तो बच्चे होते हैं वो तो जो देखेंगें वो ही सीखेंगे।
बच्चों को पूरी नींद लेने दें – नींद उनके लिए एक प्रकार का टॉनिक हैं जो ताजगी और नई जिन्दगी देती हैं वैसे तो नींद तो सबके लिए ही जरूरी हैं पर बच्चों को तो कम से कम 8 या 10 घंटे की नींद लेनी जरूरी हैं। तब जाके वो ताजगी महसूस करेंगें,10 से 12 साल तक के बच्चों के लिए कम से कम 10 घंटे नींद जरूरी हैं। पढाई का बोझ – गृहकार्य एवं टीवी देखने के कारण बच्चे लगभग 5 या 6 घंटे ही सो पाते हैं भारत के बच्चों का यही हाल हैं अधिकाँश माँ-बाप अपने बच्चों को भी अपने साथ जगाते हैं टीवी देखने के लिए देर रात तक भोजन करना टीवी देखना लोगों की आदते हो गई हैं। ये सब जब माँ-बाप देखेंगे तो बच्चे क्यू नहीं देखंगे देर रात तक जागना टीवी के सामने बैठे रहना और बच्चों पर इसका बुरा असर पड़ता हैं। एक तो स्कूल का होमवर्क का दबाव दूसरा देर रात तक जागकर टीवी देखना, दोनों के कारण बच्चों के मष्तिष्क पर भारी बोझ पड़ता हैं इस के कारण बच्चें शारीरिक और मानसिक रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं बच्चों को योग्य बनाना बहुत जरूरी हैं उनके लिए डेली रूटीन बनाया जाए व्यवस्थित ढंग से उन्हें उचित आहार ,व्यायाम, खेलकूद,और अच्छी शिक्षा दें और उन्हें नींद पूरी लेने दे और तरो ताजा रखे जीवन की सहजता को उपलब्ध होना ही मेरा मूल उद्देश्य हैं।

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