दवा के साइड इफेक्ट्स (side effects of drugs)का कड़वा सच

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दवाओं के साइड इफेक्ट(side effects of drugs)-

आधुनिक दवाओं के लिए आजकल एक शब्द का प्रयोग सामान्य रूप से किया जाने लगा है – वह है साइड इफेक्ट या दुष्प्रभाव । प्राय:यह देखा गया है कि रोगों से बचाव के लिए ली गई दवाइयों के दुष्प्रभाव उस रोग से कहीं अधिक घातक व गंभीर होते है। उदहारणस्वरूप यदि आप कोलेस्ट्रोल घटाने वाली दवाइयां लगातार तीन से चार वर्ष तक लेते है तो आपको डायबिटीज की समस्या हो जाती है और प्राय: डायबिटीज की दवाइयों को निरंतर तीन से चार वर्ष तक लेने से कैंसर की सम्भावनायें कई गुना बढ़ जाती है।
जर्नल ऑफ़ अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (1998) के अनुसार 51 प्रतिशत मंजूरशुदा दवाओं के घातक इफेक्ट्स का पता तभी चल पाता है जब मनुष्य उन्हें प्रयोग में लाता है। उदहारण के तौर पर अलग-अलग जर्नल्स से ली गई रिपोर्टे देखे

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1. लेंसेंट, दिसंबर 1999, 40 साल के अनुभव के बाद एंटीबायोटिक एरीथ्रोमाइसीन को बच्चों में पाई जाने वाली बिमारियों के साथ जोड़ा जा रहा है।
2.ब्रिटिश मेडिकल जर्नल, oct. 1999 के अनुसार कहा जा रहा है कि प्रोजैक,प्रेग्जिल ,जोलोफ्ट,ट्रेजोडॉन आदि दवाओं के कारण अधिक रक्त स्त्राव होता है जो शरीर के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। इनमें गेस्ट्रोइंटेस्टाइनल, जेंटीयुरिनरी,या इंट्रारीनल रक्तस्त्राव भी शामिल है। दर्दनिवारक व सुजन आदि को घटाने के लिए गई एस्प्रिन जैसी दवाएं भी इस खतरे को काफी हद तक बढ़ा देती हैं।
3. अमेरिकन जर्नल ऑफ़ एपिड़ेमोलोजी, मई 2000, पांच दशक के अध्ययन के बाद यह तथ्य सामने आया है कि ट्रासाइक्लिक एंटीडीप्रेसेंट (इमिप्रेमाइन, एमिट्रीप्ठीलिन) ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ा देती है।
4. जर्नल ऑफ़ क्लिनिकल साईकोफार्माकोलोजी, जून 2000 : बाजार में हाथों-हाथ बिकने वाली दवाई क्लोजापाइन से भी अचानक होने वाली मौत के अनेक मामले सामने आए है।
5.प्राइमरी साइकाईट्री सितम्बर 2000, लगभग पांच दशक के इस्तेमाल के बाद मेलारिल दवाई को कार्डीएक एरिदमिया के साथ जोड़ा जा रहा है। यह समस्या 30 साल पहले ही पाई गई थी, लेकिन हाल ही में संयोगवश फिर से इसका पता चला है। अब अंततः नोवरटिस फार्मास्युटिकल कंपनी चेतावनी देती है कि इस दवा का प्रयोग तभी किया जाना चाहिए जब अन्य सुरक्षित दवाएं भी अपना असर न दिखा पायें।
6. जेएएएमए, 22 2004, 1998 के शुरूआती दौर में,यू एस में कोलेस्ट्राल कम करने वाली दवा के रूप में सेरीवेस्टाटिन की मार्केटिंग आरंभ की गई। बाजार में उसके समान मिल रही दवाओं की तुलना में इसकी कम खुराक लेने की सलाह दी गई किन्तु आने वाले दिनों में उसका कोई प्रभाव नहीं दिखा तो दवा की मात्रा बढ़ा दी गई। इसका तुरंत प्रभाव हुआ और फिर रैबडोमायोलिसिस का किस्सा सामने आया जिसमें पता चला कि इस दवा के प्रयोग करने वाले अनेक शारीरिक असमान्यताओं व रोगों से ग्रस्त हो रहे थे। निर्माता कम्पनियों ने नाम व लेबल आदि बदल कर देखे, अनेक तरह के शोध हुए, स्वास्थ्य विभाग को अनेकों पत्र लिखे गये और आखिर में इन दवाओं को लगभग सात साल बाद बाजार से हटा दिया गया।
7. द लेसेंट, 1 जनवरी 2005 (वायोक्स दवा) वायोक्स नामक दर्दनिवारक दवाओं का एक वर्ग नॉन-स्टिरॉयडल एंटी इंफ्लामेट्री ड्रग माना गया था राष्ट्रीय स्तर पर हुए निष्कर्ष के बाद पता चला है कि मर्क एंड कम्पनी का यह उत्पाद दिल के दौरों के 88,000 से 140,000 मामलों का जिम्मेवार था। इसे 30 सितम्बर 2004 को वैश्विक बाजार से हटा दिया गया है। इस दर्द निवारक दवा ने करोडों रूपये का मुनाफा कमाया व लाखों अमरीकियों ने बेहिचक इसका सेवन किया किन्तु कई साल बाद जब इसके अन्य दुष्प्रभाव सामने आए तब इसे बाजार में बेचने पर पाबंदी लगाई गई।
8. एनल्स ऑफ़ थोरेसिक सर्जरी – 2005, 40 वर्ष तक एप्रोटिनिन के प्रयोग के बाद हुए एक रिव्यू में पता चला कि यह दवा एक अतिशीघ्र प्रभाव दिखाने वाली एलर्जी (एनाफायलैक्टिक ) उत्पन्न करती है जो प्राणघातक भी हो सकती है। पेट में दर्द होना, साँस लेने में असामान्य आवाजें आना आदि इसके अन्य लक्षणों में से हैं। एप्रोटिनिन का प्रयोग पूरी दुनिया में तेजी से फैला और इसके कई नए रूप सामने आए व अंततः इसे 2007 में प्रतिबंधित कर दिया गया।
9.दि लेन्सेंट आंन्कोलाजी, अगस्त 2009 , प्रोग्रेसिव मल्टीफोकल ल्युकोएनसेफैलोपेथी एक भयानक व प्राणघातक सेंट्रल नर्वस सिस्टम डिसऑर्डर है। रिसर्च ऑन एडवर्स ड्रग्स इवेंट्स एंड रिपोर्ट्स द्वारा किये गये एक शोध से पता चला है कि जिन रोगियों का इलाज रिटूग्जीमेब, नतालिजुमेब और इफेलिजुमेब जैसी दवाइयों द्वारा किया जा रहा था। उनमे यह विकृति विशेष रूप से पाई गई। दवा के बाजार में उतरने के साढ़े पांच साल बाद उस पर पाबंदी लगा दी गई।
10. बिएमजे (आर्काइव्स ऑफ़ डिजीज इन चाइल्डहुड ) एफडीए ने 1997 में मोटापे पर काबू पाने व वजन प्रबन्धन के लिए सिबुट्रामिन को मंजूरी दी थी। जनवरी 2010 में यूरोपियन मेडिसन एजेंसी ने इसकी मंजूरी पर रोक लगा दी और इसका लाइसेंस भी रदद् कर दिया गया क्योंकि इसके प्रयोग से कार्डियोवैस्कुलर रोगों के कई मामले सामने आए थे। इस दवा को 12.9 वर्ष के बाद प्रतिबंधित कर दिया गया।
अब इन सभी उदाहरणों से ये साफ है कि आप एक बीमारी से छुटकारा पाने अस्पताल जाते है और उपहार के रूप में एक और बीमारी लेकर लौटते है। उदाहरण के तौर पर,जरा सोचिए,एक कैंसर मरीज अस्पताल जाता है उसे इलाज के नाम पर कीमोथेरेपी का अत्याचार सहना पड़ता है। कीमोथेरेपी का आधारभुत तन्त्र यही है कि वह शरीर के लिए आवश्यक श्वेत रक्त कणिकाओं को लगभग समाप्त कर देता है जो शरीर के रोग प्रतिरोधक तन्त्र के लिए आधार का काम करते है। इस तरह रोगी कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों से ग्रस्त हो कर लौटता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता के अभाव में अनेक कठिनाईयों व दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ता है। आप इन सभी लक्षणों को तुलना एड्स ग्रस्त रोगियों के लक्षणों से कर सकते है क्योंकि उनके शरीर में वही लक्षण पाए जाते है जिन्हें हम कीमोथेरेपी करवाने के बाद पाते है।

⇒इस विडियो को देखने के बाद कोई भी व्यक्ति नही कहेगा की आयुर्वेदिक दवा असर नही करती।⇐click करें