पीमा इंडियन और हुंजा सभ्यता का स्वस्थ रहने का रहस्य(The secret to staying healthy) पार्ट -2

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The secret to staying healthy
पीमा इंडियन और हुंजा सभ्यता का स्वस्थ रहने का रहस्य (The secret to staying healthy)-

कैंपबैल विश्वविद्यालय के एक दूसरे प्रोफेसर, डॉ. कोड्वैल एसिलस्टिन, एम् दी के चाइना स्टडी डाइट प्लान से छाती में लम्बे समय तक रहने वाला दर्द (एंजाइना), एक-दो सप्ताह में अपने-आप ही ठीक हो जाता हैं। इसकी तुलना एंजाइना के लिए ली जाने वाली एक दवा से करें ‘रेनोलेजाइन’ (यह रेनिक्सा नाम से बिकती हैं) इसे 2006 में एफडीए (FDA) द्वारा स्वीकृत किया गया था। यह दवाई लेने वाले 565 रोगियों तथा केवल प्लेसबो पाने वाले रोगियों पर एक क्लिनिकल परिक्षण किया गया। दवा लेने वाले दल ने छह सप्ताह में एंजाइना के दर्द में काफी कमी पाई। इसका मतलब हुआ कि दवा लेने वाले उन व्यक्तियों में प्रति सप्ताह 4.5 एंजाइना के एपिसोड्स घट कर 3.5 तक आ गए। यह कोई बहुत ही तीव्र गति वाला समाधान नहीं था और दुष्प्रभावों की बात करें तो उन्होंने सिर चकराने, सिर में दर्द, कब्ज तथा जी मिचलाने की शिकायत की (अध्ययन ने यह नहीं बताया कि यह प्रभाव किस गति से सामने आए)। और आपके पास पश्चिम की इन दवाओं के लिए सबसे बेहतर समाधान हैं ‘चाइना स्टडी डाइट प्लान’ यह सीमित सकारात्मक प्रभावों वाले तथा संभावित दुष्प्रभावों वाले महंगे इलाजों का सही जवाब है। कुछ लोग सोच सकते हैं कि दवाओं का चाइना स्टडी डाइट प्लान से तुलना करना उचित नहीं हैं क्योंकि दवाएँ लक्षणों के उपचार के लिए बनी हैं और वे रोग की मूल जड़ तक नहीं जाती परन्तु होना यह चाहिए कि ये दवाएँ तेजी से असर दिखाएं। जब किसी के पास कोई उपाय नहीं बचता तो उसे इनकी मदद लेनी ही पड़ती हैं। यदि किसी को दिल का दौरा पड़ने के बाद अस्पताल में दाखिल किया गया हैं तो उसे उस समय रक्त के थक्के को पिघलाने के लिए थ्रोम्बोलोटिक दवा ही दी जाएगी, नसों में पालक स्मूदी का इंजेक्शन नहीं दिया जाएगा। परन्तु इस आपातकालीन के अतिरिक्त, दवाओं की तुलना में चाइना स्टडी डाइट प्लान कहीं बेहतर है क्योंकि इसमें किसी तरह के दुष्प्रभाव सामने नहीं आते। हम कल्पना करते हैं कि कुछ नेत्रहीनों को हाथी की सेहत के रखरखाव और ध्यान का काम सौंपा गया है। यह कैसा दिखाई देगा ? बेशक कोई भी पूरे हाथी का ध्यान नहीं रख पाएगा- ऐसा करना असंभव होगा। प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही विशेषज्ञता के क्षेत्र पर ध्यान देगा: टांग, दांत, सूंड, पूछ, कान व पेट। अगर हाथी कोई फफूंदी लगी मूंगफली खा ले और उसे लीवर का कैंसर हो जाए, तो कोई भी नेत्रहीन व्यक्ति इसे जान नहीं पाएगा क्योंकि उनके नियन्त्रण वाले हिस्सों पर अभी कोई प्रभाव दिखना आरम्भ नहीं हुआ है। केवल जब कैंसर अपने सभी लक्षणों सहित प्रकट होगा, तभी उन्हें इसका पता चलेगा। पहले तो सुंड वाला डॉक्टर पाएगा कि हाथी भरपेट खा नहीं रहा, पूछ वाला डॉक्टर बदबू से जानेगा कि हाथी का पेट खराब हैं। कान वाला डॉक्टर कान के बढ़े हुए तापमान को महसूस करके जानेगा कि उसे बुखार हैं। वे नेत्रहीन अपने-अपने अंगों का रख-रखाव करने के कारण,पुरे हाथी के बारे में इतनी जानकारी व अनुभव नहीं रखते इसलिए उनमें लक्षणों से परे जा कर, मूल कारण की चिकित्सा करने की योग्यता नहीं हैं। इस तरह वे लोग सामने आई समस्या को ही निपटाने के बारे में सोचेंगे। ऐसा विचार नहीं कर पाएंगे कि वह समस्या पैदा ही न हो। हमारे रोग-देखरेख तन्त्र में यही तो होता है: चूँकि वे लोग कारण को नहीं जान सकते इसलिए वे उन लक्षणों को ही समस्या मान कर उपचार में जुट जाते हैं। सुंड वाला डॉक्टर फफूंदी लगी मूंगफली को चीनी में लपेट कर खिलाने की कोशिश कर सकता है ताकि हाथी की भूख खुल जाए। पूंछ वाला डॉक्टर इस मामले में कुछ नहीं कर सकता इसलिए वह बेचारे हाथी की पूंछ पर बड़ा सारा कार्बन फिल्टर डाइपर लगा देगा और कहेगा कि आधुनिक चिकित्सा के पास इस तरह का कोई इलाज नहीं है। कानों का डॉक्टर आइसपैक से कानों के तापमान को घटाने के बाद निश्चित हो जाएगा कि हाथी का बुखार उतर गया। हमारे डिजीज केयर सिस्टम में भी यही होता हैं। यह लक्षणों को ही मूल कारण मान कर उपचार करता हैं और फिर कुछ समय बाद वे लक्षण दुबारा सामने आ जाते हैं। आजकल सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों में ऐसे ही तो चिकित्सा की जा रही हैं, जहाँ यह सिखाया व विश्वास दिलाया जाता हैं कि किसी एक रोग के लिए कोई एक दवा होनी चाहिए, वे कभी भी शरीर का संपूर्ण रूप से उपचार नहीं करते। आप इस पोस्ट में विस्तार से जानेंगे कि मधुमेह, ह्रदय रोग, उच्च कोलेस्ट्रोल तथा रक्तचाप आदि जीवनशैली से जुड़े रोगों का एक ही सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण कारण हैं, वह हैं रक्तनलिकाओं का अस्वस्थ होना यानी शरीर का वास्कुलर तन्त्र ! चाइना स्टडी डाइट प्लान शरीर के वास्कुलर नेटवर्क के उपचार के लिए कार्य करता हैं, इस तरह यह किसी एक रोग का उपचार करने के स्थान पर सभी रोगों के उपचार की व्यवस्था करता हैं।
गहराई – जब आप मधुमेह या उच्च रक्तचाप के रोगी घोषित होते हैं तो अक्सर डॉक्टर यही कहते हैं कि आप इसे दवाओं से नियंत्रित तो कर सकते हैं पर आपको आजीवन इन्हीं दवाओं के साथ जीना होगा। आप स्वयं को इस रोग से कभी मुक्त नहीं कर सकेंगे। बाईपास करके रोगी को बार-बार बाईपास सर्जरी करानी होगी या एंजियोप्लास्टी के रोगी को छह महीने बाद ही दुबारा उसी धमनी की एंजियोप्लास्टी करवानी होगी, ये सब बहुत ही आम दृश्य हैं। यह बिलकुल स्पष्ट है कि एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति केवल बाहरी स्तर पर काम करती हैं और उसकी पहल ऐसी कभी नहीं रहती कि वह रोगी के रोग की मूल जड़ या कारण पर प्रहार करे। चाइना स्टडी डाइट प्लान रोग के मूल पर प्रहार करता है और तीन से छह माह में ही सुधार दिखने लगता हैं। यह रोग को पूरी तरह से समाप्त कर देता है और दुबारा एलोपैथी की शरण में जाने की आवश्यकता नहीं रहती। अब बड़ा प्रशन यह हो सकता है कि चाइना स्टडी डाइट प्लान किसी रोग में कैसे सुधार ला सकता है ? आप इसके पीछे छिपे विज्ञान को जानना चाहेंगे।
इस व्याख्या पर ध्यान दें: हमारे शरीर में रक्तनलिकाओं का इतना विस्तृत नेटवर्क है कि उसे बिछाया जाए तो धरती से चाँद तक पहुंच जाए। आपका स्वास्थ्य प्राथमिक रूप से अपनी रक्तनलिकाओं के स्वास्थ्य पर ही निर्भर करता हैं। और रक्तनलिकाओं की सेहत मुख्य रूप से, रक्त नलिकाओं की सबसे भीतरी परत एंडोथीलिअम की सेहत द्वारा नियंत्रित व प्रतिबिंबिंत होती हैं। जब हम कोरोनरी धमनी रोगों की बात करते हैं तो एंडोथीलिअम में जमा प्लैक की ही बात हो रही होती हैं। उच्च रक्तचाप में वह परत चिपचिपी हो जाती है और कोलेस्ट्रोल व वसायुक्त तत्वों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। उच्च रक्तचाप की दशा में, पेंक्रियाटिक क्षेत्र के आस-पास की परत में सूजन आ जाती हैं जिससे कई तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आती हैं जैसे – इन्सुलिन प्रतिरोध की अवस्था! यदि आप अपनी रक्तनलिकाओं की एंडोथीलिअल परत का बचाव कर सकते हैं, उसे सूजन, अकड़न व चिपचिपा होने से बचा सकते हैं जिनमें मधुमेह, ह्रदय रोग, उच्च रक्तचाप तथा उच्च कोलेस्ट्रोल आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं। एंडोथीलिअल परत की अच्छी सेहत कायम रखने से आप अपने शरीर का आदर्श भार कायम रखते हुए, फालतू वसा घटा सकते हैं। अब अगला प्रश्न यह उठता हैं कि एंडोथीलिअल परत की अच्छी सेहत कैसे बरकरार रखी जाए ? अच्छी सेहत बरकरार रखने के लिए नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) बनाती हैं, जो कि आपकी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद हैं: हमारे शरीर में एन ओ से निम्नलिखित लाभ होते हैं:
(1) यह रक्तनलिकाओं को रिलैक्स करता हैं, जिन अंगों को रक्तप्रवाह की आवश्यकता होती हैं, उनके रक्त प्रवाह में वृद्धि करता हैं। इस तरह रक्तचाप भी आदर्श स्तर तक बना रहता हैं।
(2) यह सफेद रक्त कणिकाओं तथा प्लेटलेट्स को चिपचिपा होने से रोकता हैं। इस तरह प्लैक के कारण दिल का दौरा पड़ने का खतरा घट जाता हैं।
(3) यह धमनियों की मुलायम मांसपेशीय कोशिकाओं को जमाव करने से रोकता है जिससे कोलेस्ट्रोल का स्तर भी आदर्श तौर पर बना रहता हैं।
(4) यह रक्तनलिकाओं की भीतरी एंडोथीलिअल परत में विभिन्न स्थानों पर सूजन होने से रोकता है जिनमें अग्नाशय (पैंक्रियाज) के आसपास का क्षेत्र भी शामिल हैं, जिससे इन्सुलिन सही तरह से काम करता हैं और मधुमेह खत्म हो जाता है।
(5) इससे शरीर के मेटाबोलिक दर में वृद्धि होती है, वसा की अतिरिक्त मात्रा घटने से शरीर का भार घटाने में भी मदद मिलती हैं। इन्हीं कारणों से नाइट्रिक ऑक्साइड को मिरेकल मोलीकूल (MIRACLE MOLECULE) के नाम से भी जाना जाता है। पौधों पर आधारित पोषण से नाइट्रिक ऑक्साइड कैसे बनता हैं, यह समझने के लिए आपको जैव रसायन को समझना होगा। नाइट्रिक ऑक्साइड उत्पादन के लिए एल-आर्जिनिन की आवश्यकता होती है, जो कि एक अमीनो एसिड है जो बड़ी सफाई से, नाइट्रिक ऑक्साइड के निर्माण की एंजाइम प्रक्रिया में फिट बैठता हैं,तथा ऑक्सीजन व आर्जिनिन की मदद से नाइट्रिक ऑक्साइड बनता है। नाइट्रिक ऑक्साइड सिंथेस का एक प्रतियोगी एडीएमए (एसिमिट्रक डाईमिथाइल आर्जिनिन) होता है। सामान्य प्रोटीन मेटाबोलिज्म की प्रक्रिया में हमारा शरीर इसे बनाता है।जब शरीर में एडिएमए की मात्रा अधिक हो जाती है तो नाइट्रिक ऑक्साइड का स्तर गिर जाता हैं। इसके अतिरिक्त एक और एंजाइम होता है – डाईमिथाइल आर्जिनिन डाईमिथाइल अमीनो हाईड्रालोस (डीडीएचए) – यह एडीएचए को नष्ट करता है ताकि नाइट्रिक ऑक्साइड के उत्पादन में वृद्धि हो सके। परन्तु कार्डियोवास्कुलर से जुड़े खतरों के कारक (उच्च कोलेस्ट्रोल, उच्च ट्राईग्लीसराइड, उच्च होमोसिस्टीन, इन्सुलिन रेजिस्टेंस, हाइपरटेंशन व तंबाकू) उस नाजुक एंजाइम की एडीएमए को नष्ट करने की योग्यता को बाधित कर देते हैं। यह जैव रसायन प्रक्रिया स्पष्ट करती है कि वह प्रमुख तन्त्र कौन सा है जो रोगियों को बीस साल से भी अधिक समय तक दिल के दौरों से दूर ले जाता है। उनका पादप आधारित भोजन कार्डियावास्कुलर खतरों को घटा देता है या पूरी तरह से मिटा देता है। रोगी इसे जितना अधिक अपनाता हैं, खतरे उतने ही घटते जाते हैं। इस दौरान एंजाइना के लक्षण भी घटते हैं, जो कि दिल के रोगों का सबसे भयावह तथा नियन्त्रण के बाहर रहने वाला कारक हैं। सामान्यत: शारीरिक प्रयत्नों अथवा सशक्त भावों के कारण एंडोथीलिअम हरकत में आता है, नाइट्रिक ऑक्साइड का उत्पादन करता हैं, रक्त नलिकाओं में रक्त का संचार सुचारू करता है तथा ह्रदय की माँसपेशियों में रक्त के प्रवाह को सुचारू करता है। कोरोनरी रोगों में,एंडोथीलिअम की क्षमता में काफी कमी आ जाती हैं। उसकी संकरी कोरोनरी धमनियों में रक्त का प्रवाह सही तरह से नहीं हो पाता इसलिए ह्रदय की मांसपेशियों को उतना रक्त नहीं मिलता, जितने कि उन्हें आवश्यकता होती है।
नतीजा: दर्द। यह हल्का या बहुत ही भयंकर हो सकता है। कई रोगी ‘कार्डियक क्रिप्लस’ हो जाते हैं, वे स्वयं को शारीरिक श्रम करने, यौन संबंध बनाने या सशक्त भावों को प्रकट करने में अक्षम महसूस करने लगते हैं। ऐसे रोगियों को राहत देने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि उनके ह्रदय की मांसपेशियों को अधिक रक्त पहुंचाया जाए, बावजूद इसके कि उनकी धमनियों में जमाव के कारण रक्त का प्रवाह सही तरह से नहीं हो पा रहा। यह कैसे हो सकता है ? हमें एंडोथीलिअम द्वारा नाइट्रिक ऑक्साइड की उत्पादन क्षमता में वृद्धि करनी होगी। न्यूट्रीशनल फूड में रेडिकल शिफ्ट के प्रभाव नाटकीय, तीव्र व अदभुत होते हैं। जो लोग केवल साबुत अनाज व् पौधों पर आधारित आहार ही लेते हैं, उनकी रक्तनलिकाओं की भीतरी परत की सेहत बरकरार रहती हैं। समय के साथ-साथ नई रक्तनलिकाएं, कॉलेस्ट्राल, जमाव वाली धमनियों के पास बन जाती हैं- जिसे आप-‘बिल्ट इन बाईपास’ कह सकते हैं तो अगर कोई धमनी पूरी तरह से बंद हो जाए तो दिल का दौरा नहीं पड़ेगा बल्कि रक्त के प्रवाह के लिए एक और मार्ग बन जाएगा। इस प्रक्रिया को आर्टिरियोजेनीसिस या नेचुरल बाईपास कहते हैं। जबकि जो धमनी 30% से 40% तक बंद होती है। वह कोलेट्रल (COLLATERAL) आर्टरी या सेल्फ बाईपास भी तैयार नहीं कर पाती और भावनात्मक तनाव के दौरान दिल का दौरा पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। जब आपके दिल की कोई धमनी सिकुड़ जाती है तो जमाव में टूटन आ सकती हैं। जब किसी प्लैक में टूटन आती है तो उस आर्टरी में, कुछ ही सैकेंड में 30-40%से 100 तक रुकावट आ सकती है। इसे ही कैटेस्ट्रांफिक प्रोग्रेशन कहते हैं (इसका नाम जितना बुरा है, यह स्वयं भी उतना ही बुरा होता है। यह दिल के दौरे, लकवे या कार्डियक मौत का कारण बन सकता है। किसी भी शरीरिक या भावनात्मक तनाव से भी प्लैक में टूटन आ सकती है। इसी से पता चलता है कि अधिकतर रोगियों में एंजियोप्लास्टी या बाईपास होने के बाद भी रोग दुबारा क्यों लौट आता है। ज्यादातर डॉक्टर केवल 30% ब्लोकेज वाली धमनी में स्टैंट नहीं डालेंगे या उसकी बाईपास नहीं करेंगे क्योंकि उनकी संख्या काफी होती हैं और तकनीकी रूप से एक- एक की एंजियोप्लास्टी या बाईपास करना संभव नहीं होता, जबकि इन्हीं के कारण अचानक दिल का दौरा पड़ता है और कुछ भी भयंकर परिणाम सामने आ सकते हैं। यदि आप चाइना स्टडी डाइट प्लान का पालन करते हो तो आपका शरीर स्वयं ही नाइट्रिक ऑक्साइड बनाने लगता है, जिससे सारी ब्लोकेज खुल जाती हैं जिससें 30% से 40% तथा 90% से 100% तक भी ब्लोकेज शामिल हैं। इसके साथ शरीर का पूरा तन्त्र फिर से जींवत हो जाता हैं। इसे आर्टिरियोजेनीसिस कहते हैं। यह शरीर की अपनी क्षमता है, जिसके द्वारा वह नई आर्टरीज बनाता है। जबकि कुछ नाड़ियां बिल्कुल जाम होती हैं और काम नहीं कर पातीं। वह रक्त को दूसरी नई बनी नाड़ियों से भेजने की व्यवस्था करता हैं। इसे मेडिकल समुदाय द्वारा शरीर का अपना बाईपास कहा जाता है। शरीर का यह तन्त्र केवल ह्रदय तक सीमित नहीं होता। यह शरीर के बाकी अंगों के लिए भी काम करता है। इसी से स्पष्ट होता हैं कि किस तरह नाइट्रिक ऑक्साइड पुरषों में नपुंसकता को रोकता हैं, यही वियाग्रा के कारगर होने का भी आधार है, जो लिंग में उत्तेजना पैदा करती है। परन्तु सावधान रहें, जैसा कि आप जब शरीर की पोषण संबंधी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए सप्लीमेंट या गोलियों की मदद लेते हैं तो इससे पूरे शरीर के जैव रसायन में गड़बडी हो सकती है। शरीर द्वारा नाइट्रिक ऑक्साइड उत्पन्न करने की योग्यता उत्पन्न करने के लिए स्टीरोयड्स जैसे कृत्रिम साधनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। जैसे कि कुछ बोडी बिल्डर या कुछ अभिनेता भी कहते हैं।
लन्दन 2012 के ओलंपिक्स में, आपने वेटलिफ्टिंग करने वाले व्यक्ति को फाइनल लिफ्ट से पहले कोई वस्तु सूंघते देखा होगा। यह नाइट्रिक आक्साइड गैस है और यह रसायनिक धोखाधड़ी है। वे पकड़े नहीं जा सकते क्योंकि लैब टेस्ट से पहले ही उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है। ऋतिक रोशन, शाहरुख खान, आमिर खान,तथा हाल ही में फरहान अख्तर या रणबीर सिंह जैसे अभिनेता, एक ही माह में कैसे अपनी मसल्स व सिक्स पैक बना लेते हैं। यह नाट्रिक ऑक्साइड के स्ट्रीरोयड्स का कमाल है। नाट्रिक ऑक्साइड स्ट्रीरोयड्स सप्लीमेंट खासतौर पर एथलीट व बोडी बिल्डरों के लिए बनाए जाते हैं। ये केमिकल शरीर के लिए हानिकारक होते हैं। परन्तु शरीर के रसायनिक कारखाने में बना नाट्रिक ऑक्साइड कुदरती,सेहतमंद व बिना किसी दुष्प्रभावों के होता है। यह जैविक रूप से विवाद का विषय है, अन्यथा क्या कोई स्पष्ट कर सकता है कि लाखों युवक सालों तक जिम में अभ्यास के बाद भी वैसे सिक्स पैक नहीं बना सकते, जैसे कि ये अभिनेता कुछ ही समय में दिखाने लगते हैं। इसी तरह कुछ ही समय में वह गठा हुआ शरीर एकदम गायब भी हो जाता हैं। वे उसके लिए बहाना बनाते हैं कि उन्हें अगली फ़िल्म के लिए ऐसी फिगर चाहिए थी। इसमें भी कोई शक नहीं कि वे जितनी बार विदेशों में शूटिंग के लिए जाते हैं उन्हें उतनी ही बार और विदेशी दौरे भी करने पड़ते हैं ताकि इन कामों से उत्पन्न मेडिकल जटिलताओं का इलाज करा सकें। तो चाइना स्टडी डाइट प्लान अपनाएं और अपने शरीर को एक मौका दें कि वह आपको रोगमुक्त कर सके, आपके कष्ट को दूर कर सकें। विद्वान डॉक्टर के आगे अपना तर्क रखो कि आप लोगों को इस बारे में जागरूक क्यों नही करते और उन्हें भोजन व जीवनशैली में सुधार के लिए क्यों नहीं कहते तो उनका जवाब यही होता हैं कि कुछ लोग शायद इस चाइना स्टडी डाइट प्लान को अपनाना न चाहें और रोगियों को कई बार आजीवन गोलियां निगलना कहीं आसान लगता हैं, भले ही उनका इलाज न हो रहा हो और उनके शरीर के तन्त्र की जटिलताएं बढ़ती जा रही हों। जबकि सच यह हैं कि डॉक्टर रोगियों से इस बारे में बात करते हैं तो वे कहते हैं कि आप जो कहेंगे, हम वहीं करेंगे, बस हमें शरीर की चीरफाड़ से बचा लीजिए। भला कौन व्यक्ति हामी भरते हुए, उस फोर्म पर हस्ताक्षर करना चाहेगा, जिस पर लिखा होता हैं कि अगर सर्जरी के दौरान वह मारा गया तो वह उसका अपना खतरा है जबकि कुछ भी बदतर होने की संभावना लगातार बनी रहती हैं क्योंकि वे तथाकथित डॉक्टर आजीवन प्रेक्टाइसिंग डॉक्टर या प्रेक्टाइसिंग सर्जन ही कहलाते रहते हैं और अपनी रिटायरमेंट के आखिरी दिन तक भी रोगियों की सेहत और पैसे के साथ प्रेक्टिस ही करते रहते हैं। आपको आजीवन गोलियां निगलने से कहीं बेहतर होगा कि आप स्वस्थ चाइना स्टडी डाइट प्लान का अनुसरण करें। अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन में भी यही कहा गया है कि दो तिहाई रोगी केवल 12 महीने के बाद ही स्टैटिन ड्रग्स का सेवन बंद कर देते हैं।

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