मस्तिष्क के तीन (Three types of brain) मनोवैज्ञानिक प्रकार

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Three types of brain

मस्तिष्क के तीन (Three types of brain) मनोवैज्ञानिक प्रकार अब आप जान सकते हैं कि हमारा दिमाग कैसे कम काम करता है। वह किस प्रकार पहले बुद्धि से काम लेता है और फिर अपने स्मृति भंडार की सेवाएं लेता है।

अब हम आपको बताने जा रहे हैं कि दिमाग कितने प्रकार का होता है। नि:संदेह, आप यह पढ़ कर चौंक गए होंगे कि दिमाग तो एक ही प्रकार का होता हैं परन्तु हम आपको इससे भी बहुत अधिक बताने जा रहे हैं। दिमाग तीन प्रकार का होता हैं। इनमें से ‘पहला ब्रेन’ तो इस धरती पर जन्म लेने वाले प्रत्येक जीव में पाया जाता है। यह पशुओं के पास भी पाया जाता है। यह उन सभी बुनियादी विशेषताओं से भरपूर है जो एक पशु में भी पाई जाती हैं जैसे खाना-पीना, अपना बचाव करना, प्रजनन करना, तापमान तथा ह्रदय व श्वास दर नियन्त्रण आदि। इसके सभी गुण आटोमेटिड होते हैं यानी आपको अपने-आपको यह याद दिलाना होता की आपको सांस लेनी हैं। आप चाहे कोई भी कार्य क्यों न कर रहे हों। सांस तो अपने आप ही चलती रहती है।
‘दूसरा ब्रेन’ इमोशनल ब्रेन कहलाता है। यह भावनाओं तथा पिछले संदर्भो से जुड़ा होता है। इसमें भय, गुस्सा, स्नेह व जलन आदि भाव भी शामिल होते हैं। कई बार हम किसी भी चीज के बारे में कोई ख़ास धारणा रखते हैं और उसके बारे में कोई निश्चित तर्क नहीं दे पाते। दरअसल यह इसी ब्रेन की करामात होती हैं। यहाँ तर्क कोई काम नहीं आता। मान लेते हैं कि बचपन किसी व्यक्ति की मोटरसाईकिल से टक्कर हुई थी। उसके दिमाग में आज भी उस घटना की यादें बसी हैं। आज भी वह किसी मोटरसाईकिल की आवाज सुनता हैं। तो उसे लगता है कि वहाँ से भाग निकले क्योंकि उसका दिमाग उसे पिछले अनुभव के आधार पर राय देता हैं कि यह जगह उसके लिए खतरनाक हो सकती हैं। यह दिमाग बड़ी आसानी से रस्सी को भी सांप मान लेता हैं। इसे तर्क दिया जाए तो भी बात नहीं सुनता। इसे केवल प्रतिक्रिया देना आता हैं। यह दिमाग पल भर में ही अपने-आप को परिणाम थमा देता हैं।
इसे जानने के लिए ये देखे कि – (1) में इस परीक्षा में पास नहीं होऊंगा।
(2) मुझे कभी डेट का मौका नहीं मिलेगा- में लोगों से सही तरह से बात नहीं कर पाता।
(3) में सब कुछ कभी नहीं पा सकता। इस टैस्ट के लिए जो भी जानकारी चाहिए, में सब कुछ नहीं सिख सकता।
(4) मेरा काम कभी पूरा हो ही नहीं सकता क्योंकि मेरा बोस बड़ा कठोर हैं।
(5) में घर जाता हूँ तो मुझे अपने लिए कभी समय नहीं मिलता क्योंकि मुझे बच्चों का कोई न कोई काम करना होता हैं।
(6) विकएंड में मुझे इतनी थकान महसूस होती है कि में खड़े होकर घरेलू काम नहीं निपटा सकती।
(7) काश मेरे पास और अधिक ऊर्जा होती; मुझे तो हैरानी इस बात की है कि मुझे हो क्या गया हैं।

‘तीसरे ब्रेन’ को हम टैलेंट ब्रेन का नाम दे सकते हैं। यह तीनों प्रकार के मष्तिष्कों के बीच संबंध स्थापित करने का काम करता हैं। तभी हमारे दिल और दिमाग में आपसी संगति बन सकती है। इस दिमाग को अपने हिसाब से प्रशिक्षित किया जा सकता है। पहले व दूसरे ब्रेन का इसके साथ तालमेल होने से आप दिल और दिमाग के उस सामंजस्य को पा लेंगे जिसे पाने के बाद कोई भी कार्य कठिन नहीं रह जाता। आपकी कल्पनाएं भी साकार रूप लेने लगती हैं। कई मनुष्य अपने तीसरे दिमाग का थोड़ा- बहुत प्रयोग करते हैं परन्तु कई व्यक्तियों का तीसरा दिमाग तो पूरी तरह से अप्रयुक्त ही रह जाता हैं। हम ही लोगों पर काम करना चाहते हैं। अब हम जानेंगे कि जिन लोगों ने अपने इन तीसरे ब्रेन का पूरा उपयोग किया हैं, उन्होंने इसके लिए क्या तकनीक अपनाई। हम यहाँ आपको ब्रूस ली का उदाहरण देना चाहेंगे- 9 जनवरी 1970 को ब्रूस ली ने अपने नाम एक पत्र लिखा ‘ए सीक्रेट लैटर टू माई सेल्फ’। उस पत्र में उन्होंने आने वाले दस वर्षो से जुड़ी इच्छाओं को विस्तार से लिखा और लिखा कि वे 1980 तक दुनिया में सबसे लोकप्रिय अभिनेता बनेंगे। वे उस पत्र को सदा जेब में रखते थे और
लोगों का कहना है कि उसे दिन में निकल कर कई बार पढ़ते भी थे। 1973 में उनकी पहली फ़िल्म ‘एंटर द ड्रैगन’ रिलीज हुई और वे सबसे ज्यादा पारिश्रमिक पाने वाले नायकों की सूची में आ गए। होलीवुड में उनका वह पत्र आज भी संभाल कर रखा गया हैं। यह कमाल केवल पत्र लिखने से नहीं हुआ था। यदि ऐसा होता तो हम सब भी केवल एक पत्र लिख कर ही सफल हो जाते। दरअसल उन्होंने पत्र लिखने तथा दिल-दिमाग के परस्पर सामंजस्य के विज्ञान को समझ लिया था। सन् 1954 तक यही माना जाता था कि इंसान के शरीर की बनावट ऐसी है कि लाख चाहने पर भी एक मील की दूरी चार मिनट से कम समय में नहीं तय कर सकता। उस साल, रोजर बेनिस्टर नामक युवक ने इस दूरी को 3 मिनट 59 सेकेण्ड में पूरा करते हुए रिकॉर्ड बनाया। हैरत की बात तो यह हुई कि उसी साल के अंत तक, अन्य 32 लोगों ने भी ऐसा कर दिखाया। अगले तीन सालों में दुनिया के लगभग 200 से अधिक लोग इस एक मील की दुरी को 4 मिनट से कम समय में पूरा करके दिखा चुके थे। जिस काम को अनेक वर्षो से असंभव माना जाता था। वह अचानक ही संभव हो गया। ऐसे ही रिकार्डो से प्रेरित होकर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड का आरम्भ किया गया। उनका मानना था कि जब कोई व्यक्ति यह समाचार पढ़ता है कि अमुक स्थान पर अमुक व्यक्ति ने यह असंभव सा दिखने वाला काम कर दिखाया है तो उसे भी कुछ कर दिखाने की प्रेरणा मिलती है। जब रोजर से उनकी सफलता का राज पूछा गया तो उन्होंने बताया कि वे अपने दिमाग में इस काम को पहले कई बार दोहरा चुके थे। अपने-आप को वह रिकॉर्ड तोड़ते हुए देख चुके थे। दरअसल दिमाग यह नहीं जान पाता कि हम किसी घटना का मानसिक चित्रण कर रहे हैं या उसका वास्तविक रूप में अभ्यास कर रहे हैं। हम अपनी कल्पना में जो भी देखते हैं, वह निश्चित तौर पर हमारे एक्शन व शरीर को प्रभावित करता है। दुनिया में आपकी तरह सोचने वाले लोगों के दिमाग तक भी यह विचार कभी भी पहुंच सकता हैं। अक्सर हम कहते हैं कि ‘अरे! मेरे दिमाग में यह विचार आया है।’ हम उसे जन्म नहीं देते। वह तो पहले से ही मौजूद होता है हमारा दिमाग उसे अपनी परिस्थितियों के अनुसार सामने ले आता है। यदि हम अपने विचार या आविष्कार को किसी के सामने लाए बिना बात को वहीं छिपा लें और यह सोचें कि छह माह बाद वह आपको फलीभूत दिखाई देगा। दरअसल आप जो सोच रहे हैं, दुनिया के किसी भी दूसरे हिस्से में, कोई और इंसान वहीं सोच रहा है और हो सकता है कि वह अपने विचार को मूर्त रूप देने में आपसे आगे निकल जाए। इसी प्रक्रिया को ‘साइंस ऑफ फ्लो ऑफ नॉलेज’ कहते हैं मतलब अगर आपके मन में कोई सवाल है तो पूरे मन से मानसिक चित्रण करो, इस ब्रह्माण्ड में ही कहीं आपके सवाल का जवाब मौजूद है जो देर-सवेर तक आप तक पहुंच ही जाएगा। यह जरूरी नहीं कि वह प्रत्यक्ष तौर पर सामने आए। वह किसी सपने, अनुभव या जानकारी के रूप में भी सामने आ सकता है परन्तु हमारे साथ कठिनाई यह है कि हम अपने सवालों के लिए खोजे जा रहे जवाबों के प्रति अपनी गहनता नहीं दर्शाते, वे हमारे सामने आते भी हैं तो हम उन्हें उपेक्षित कर देते हैं। हमारे दिमाग के पास ऐसी छिपी ताकत होती है जो संकट या खतरे के समय मनुष्य के लिए सहायक बनती हैं। वह उसके शरीर की पूरी ऊर्जा को उस समय सहायता के लिए प्रस्तुत कर देती है ताकि मनुष्य संकट से बच जाए और आपातकाल से मुक्ति मिले। हमारे शरीर में अगर रोग उत्पन्न करने की क्षमता है तो यही क्षमता उस रोग को मिटा भी सकता है। इसके पास रिवर्स एक्शन का पूरा तन्त्र मौजूद है जो हमारी ही अज्ञानता के कारण हमें दिखाई नहीं देता। हम अक्सर समस्या पर ही विचार करते रह जाते हैं और समाधान की ओर नहीं देखते। बस हमें रोग मिटाने के लिए अपने दिमाग में एक सही तस्वीर डालनी होगी। जब कोई रोगी दिन-रात अपने रोग का रोना रोता है तो उसका दिमाग भी स्वयं को रोगी मान लेता है। रोगी को अपने दिमाग को यह तस्वीर दिखानी चाहिए कि उसे कोई रोग नहीं हैं। यदि कोई रोग था भी तो अब धीरे-धीरे ठीक हो रहा है। एक पोस्ट के अनुसार यदि हम किसी चीज या सोच में बदलाव लाना चाहते हैं तो हमें सच्चे संकल्प के साथ उस कार्य को 21 दिन तक दोहराना चाहिए। फिर वह हमारे जीवन का एक अंग बन जाता है। जब हम अपने दिमाग को यह बता देते हैं कि हम आने वाले कल से क्या चाहते है, उसके कारण हमारे जीवन में क्या बदलाव आएँगे और उसकी मानसिक तस्वीर कैसी होगी तो हमारे दिल व दिमाग में परस्पर तालमेल पनपने लगता है। हमें सपनों में उससे जुड़े संकेत मिलने लगते हैं।
(1) यह पहचानें कि आप तनाव का अनुभव कर रहे हैं और अपने को उस जगह से थोड़ा परे ले जाएँ ताकि अपने विचारों तथा भावनाओं पर रोक लगाई जा सके।
(2) अपने ध्यान को ह्रदय की ओर ले जाएँ और इस तरह सांस लें कि वह दिल से होते हुए पेट की ओर जा रही है।
(3) मन ही मन अपने वांछित भविष्य का वीडियो करीब तीन मिनट तक देखें।
(4) अब वर्तमान में आ कर स्वयं से पूछें कि इस हालात से निपटने का बेहतर तरीका क्या होगा या किस काम से आपका तनाव घटता है।
(5) अब यह देंखे कि इस तरह हालात के बारे में आपकी राय व भावनाओं में कोई बदलाव आया या नहीं ? दिल व दिमाग के आपसी सामंजस्य द्वारा उच्च रक्तचाप को कैसे ठीक किया जा सकता है। दिल व दिमाग के आपसी सामंजस्य से बनी तकनीक दर्शाती है कि किसी भी रोग में मन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है तथा इसे सकारात्मक रूप से प्रयोग करते हुए रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है। दिल तथा दिमाग एक दूसरे को प्रभावित करते हैं और हम इसी प्रभाव को निर्देशित करते हुए रोगों से मुक्त हो सकते हैं। आप जानते हैं कि भले ही आप किसी भी रोग से ग्रस्त क्यों न हों, मधुमेह हो या मोटापा या फिर उच्च रक्तचाप, कष्ट व पीड़ा का कारण केवल दो तथ्यों पर निर्भर करता है – आप क्या सोचते हैं तथा आप क्या खाते है। अगर यही तथ्य है तो सबसे अच्छी बात यह है कि केवल एक ही व्यक्ति आपको आरोग्य प्रदान करने में सहायता कर सकता है और वह व्यक्ति आप स्वयं ही हैं। आपको इस पोस्ट में दी गई जानकारी न केवल आपको अपनी सेहत में सुधार की ओर ले जाएगी बल्कि आपको प्रेरित भी करेगी कि आप इस जीवनरक्षक जानकारी को चारों ओर प्रसारित करें ताकि यह राष्ट्र एक स्वस्थ राष्ट्र बन सके। धन्यवाद  

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