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निरोगी नहीं आपको रोगी बनाने के लिए लिखते है अनावश्यक जाँच (Unnecessary investigation a conspiracy)

unwanted medicines
 अनावश्यक जाँच (डॉक्टरों का काला सच)-(Unnecessary investigation a conspiracy)
जरा सोचिए, अगर ऐसा हो कि आपकी कार रास्ते में चलते-चलते खराब हो जाए और फिर कुछ समय बाद वह खुद ब खुद ठीक भी हो जाए या कभी आपकी कार का पंचर हो जाए और कार खुद ही अपना पंक्चर ठीक कर लें! इन मशीनों के साथ ऐसा होना एक ख्वाब ही हो सकता है लेकिन इन्सान रूपी मशीन के साथ ऐसा ही होता है।
जब आपके शरीर के किसी भी अंग में चोट लगती है या अंग का कोई हिस्सा कट जाता है तो वहां से खून बहना शुरू हो जाता है। फिर खून जमा होकर जख्म को भर देता है और कुछ दिनों में आप पूरी तरह ठीक हो जाते है। उसी प्रकार आपके शरीर में यदि कोई वायरस प्रवेश करता है तो रोग प्रतिरोधक क्षमता आपके शरीर का तापमान बढ़ा देती है जिससे वह हानिकारक वायरस अपनी सक्रियता खो देता है और कुछ समय बाद आपका बुखार उतर जाता है।
मशीन और मानव शरीर में यही बड़ा अंतर है।
हमारा शरीर किसी कारखाने में निर्मित उत्पाद नहीं है। कारखाने से निकले उत्पाद तो पूरी तरह से टी किये गये मानक के अनुसार हो सकते है किन्तु मनुष्य के साथ ऐसा नहीं होता है। इस संसार में प्रत्येक प्राणी अपने आप में खास है।उत्पाद को बाजार में उतारने से पूर्व उसकी गुणवत्ता यानि क्वालिटी की जाँच की जाती है ताकि उत्पाद में भूल या खराबी की सम्भावना  पर पहले पर पहले ही रोक लगा दी जाए।
यदि किसी उत्पाद में कमी है तो लाख चाहने पर भी स्वयं को ठीक नहीं कर सकता है। किन्तु मानव शरीर में स्वयं को ठीक करने की अद्भुत क्षमता है। आपके शरीर में हर पल अनगिनत कोशिकाएं टूटती रहती है और आपका शरीर खुद-बी-खुद दोबारा उन्हें बना लेता है या मरम्मत कर लेता है किन्तु जब हॉस्पिटल जाते है तो आपके शरीर की जाँच कुछ इस प्रकार की जाती है मानो आप कोई इन्सान नहीं एक मशीन हों।
इस बात को समझने के लिए जरा इन उदाहरणों पर गौर करें:-
1. 1991 में इन्वेस्टीगेटिव रेडियोलोजी नामक जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार एक प्रयोग में कुछ ऐसे लोगो को इकट्टा किया गया जिनमे गालस्टोन्स से जुड़े कोई भी लक्षण नहीं थे। फिर उन सब पर यूं ही गालब्लेडर रोग की सम्भावना को पता लगाने के लिए अल्ट्रासाउंड से स्केन किया गया तो पाया कि 10 प्रतिशत लोगों में गालस्टोन मौजूद था।
2.न्यू इंगलैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसन, 1994 के रिपोर्ट के अनुसार ऐसे लोगों को इकट्टा किया गया जिनको न तो बैक पेन था और न ही बैक पेन का इतिहास,लेकिन एमआरआई से बैक स्कैन किये जाने के बाद यह पता चला की 50 प्रतिशत से भी ज्यादा लोगों में बल्जिंग लंबर डिस्क की समस्या है।
3.न्यू इंगलैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसन, 2008 के अनुसार एक प्रयोग लोगों को इकट्टा किया जाता है जिनको न तो घुटनों में दर्द था और न ही घुटने के दर्द से जुड़ा इतिहास। इसके बावजूद एमआरआई द्वारा घुटने की स्केनिंग की गई तो लगभग 40 प्रतिशत लोगों के घुटनों में मेनिसकस डैमेज पाया गया।
निष्कर्ष यह है कि हमारे शरीर में हर समय कई के जोड़-तोड़ चलते रहते है। यह शरीर एक रहस्य है। परन्तु हम अपने शरीर के सेल्फ हीलिंग मैकेनिज्म (शरीर द्वारा स्वयं की चिकित्सा करने का तन्त्र) पर विश्वास न करके घबराकर अपने आपको डॉक्टरों या सर्जनों के सुपूर्द कर देते है।
इसके बाद एमआरआई या अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट में जो कमियां नजर आती है, डॉक्टर उसे ठीक करने में जुट जाते है। जिससे आपके शरीर का सूक्ष्म संतुलन बिगड़ जाता है और एक से दूसरी और दूसरी से तीसरी बीमारी का ऐसा सिलसिला शुरू होता है जो कभी थमने का नाम ही नहीं लेता है।
टाइम मैगजीन की रिपोर्ट के मुताबिक, मृत्यु के बाद शरीर के एटोप्सी टेस्ट से पता चला कि लगभग 98 प्रतिशत लोगो के शरीर में कैंसरयुक्त कोशिकाएं निष्क्रिय रूप में विद्यमान रहती है। आपको उनके शरीर में होने या न होने से कोई नुकसान नहीं होता है। लेकिन कुछ कारणों से ये निष्क्रिय कैंसरयुक्त कोशिकाएं सक्रिय हो जाती है। वे कारण निम्न है:
1. लगातार कुछ महीनों तक ऐसी दवाओं का सेवन करना जो अक्सर डायबिटीज,कोलेस्ट्रोल,या हाई ब्लड प्रेशर के मरीज करते है या बर्थ कंट्रोल पिल्स का लम्बे समय तक सेवन करना भी कैंसरयुक्त सेल्स को सक्रिय कर सकता है।
 
2. किसी भी प्रकार का डायग्नोस्टिक एक्सरे जैसे -मेमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड आदि कैंसर को बुलावा देते है।
फिनलेंड के पैथोलोजिस्ट की रिपोर्टस के रिकोर्ड के अनुसार गले की एटोप्सी में पाया गया की लगभग हर इन्सान के थाईराइड में कैंसर सेल्स बहुत कम मात्रा में ही होते है। इसलिए निष्क्रिय कैंसरस सेल्स का थायराइड ग्लैंड में होना सामान्य माना जाना चाहिए परन्तु आज अस्पताल यह प्रचार कर रहे है कि हर साल आपको अपना शरीर स्कैन करवा कर यह देखना चाहिए कि शरीर में किसी कैंसर युक्त कोशिका के होने की सम्भावना तो नहीं है।
गाइड टू क्लिनिकल प्रिवेंटिव सर्विसेज, 1996 में यह सुझाव दिया गया कि हर साल थाईराइड कैंसर की स्क्रीनिंग आवश्यक है। 1996 के बाद थाईराइड कैंसर के मामलों में अचानक वृद्धि पाई गई। खास बात यह है कि अक्सर ऐसे मामलों में डॉक्टर थाईराइड ग्लैंड्स को सर्जरी के माध्यम से निकल देने की कोशिश करते है जिसकी कतई आवश्यकता नही होती है।
थाईराइड ग्लैंड एक ऐसा आवश्यक ग्लैंड है जिसके निकल देने से पुरे शरीर की बायाकैमेस्ट्री एकदम से बिगड़ जाती है और मरीज एक जिन्दा लाश की तरह हो जाता है। सन 2005 तक थाईराइड कैंसर के मामले महज जाँच की वजह से या जाँच के बाद कई गुना बढ़ गये जबकि थाईराइड कैंसर से होने वाली वास्तविक मृत्यु के आंकड़े 1975 में जितने थे, सन 2005 में भी उतने ही है। मतलब बिल्कुल साफ है कि अस्पतालों की एक ही कोशिश रहती है कि वे आवश्यक रूप से किसी भी बहाने आपको रोगी बना दें। इसके साथ ही एक ऐसी चिकित्सा प्रदान करें जिसकी आपको कभी आवश्यकता ही नहीं थी।
अब मेमोग्राफी यानि ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग पर जरा गौर कीजिए। अस्पतालों द्वारा यह प्रचारित किया जाता है कि 40 वर्ष की आयु के बाद प्रत्येक महिला को ब्रेस्ट कैंसर होने या होने के लक्षणों का पता चलाने के लिए स्क्रीनिंग करवानी चाहिए।
इसी मेमोग्राफी का सच जानने की कोशिश करते है:-
नेशनल सेंटर फॉर हेल्थ स्टेटिस्टिक्स (यूएस गर्वनमेंट के स्वास्थ्य विभाग का अंग) के अनुसार अगर 2000 महिलाएं लगातार 10 साल तक मेमोग्राफी कराती है तो 2000 में से केवल एक ही महिला को ही इस स्क्रीनिंग का लाभ मिलेगा। मतलब साफ है कि स्क्रीनिंग की वजह से 2000 में से किसी एक महिला का स्तन कैंसर ही शुरूआती स्टेज में पकड़ा जाता है, जिससे उसके स्तन कैंसर के ठीक होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
अब इस बात पर गौर करिये कि लगातार मेमोग्राफी से कितनी प्रतिशत महिलाओं को नुकसान होगा। 1992 से 1997 के बीच नार्वे सरकार द्वारा प्रायोजित किये गये दो शोधों से यह प्रमाणित हुआ कि मेमोग्राफी की तरंगे शरीर में कैंसर पैदा करती है। लगातार छह वर्षो तक अगर किसी महिला ने मेमोग्राफी टेस्ट करवाए तो उसके ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित होने की सम्भावना लगभग 22 प्रतिशत बढ़ जाती है।
ठीक इसी तरह बार-बार एक्सरे या एमआरआई द्वारा की जाने वाली जाँच -पड़ताल नुकसानदेह हो सकती है।
जरा इन उदाहरणों को गौर से देखें:-
केस 1. एक महिला मिर्गी के दौरे पड़ने के कारण ब्रेन स्कैन के लिए पहुंची। स्कैन के दौरान उसके साइनस में एक सिस्ट पाया गया। हालाँकि सिस्ट का मिरगी के दौरे से कोई लेना-देना नहीं है।
केस 2. एक पुरुष रीढ़ की हड्डी में चोट के कारण एक्सरे कराने गया और रेडियोलोजिस्ट ने फेफड़ो में एक दाग खोज निकाला। हालाँकि इस फेफड़े के दाग का रीढ़ की हड्डी से कोई लेना-देना नहीं है।
केस 3. एक महिला अपनी साँस लेने की तकलीफ के कारण सीटी स्कैन करवाने गई और अनजाने में ही उसके लीवर में गांठ पाई गई। जबकि इस लीवर की गांठ का साँस की दिक्कत से कोई सम्बन्ध नहीं है।
इस प्रकार जब शरीर के अन्दर स्कैन किया जाता है तो रेडियोलोजिस्ट का ध्यान किसी न किसी अप्रत्याशित वृद्धि पर चला जाता है। डॉक्टर इस प्रकार की खोज को ‘इंसीडेंटल्स’ के नाम से बुलाते है। ऐसी ग्रोथ आपके शरीर में आती और जाती रहती है और डॉक्टर उसे अनावश्यक ही कैंसर युक्त कोशिकाओं में वृद्धि का नाम दे देते है। फिर एक अच्छे खासे स्वस्थ व्यक्ति पर कैंसर के सारे इलाज थोप दिए जाते है जिसकी उसे कभी जरूरत ही नहीं थी।
आर्काइव्स ऑफ़ इंटरनल मेडिसन (1994) की रिपोर्ट के अनुसार अगर किन्ही स्वस्थ 100 आदमियों के फेफड़ों का सीटी स्कैन किया जाए तो लगभग 35 प्रतिशत लोगों के फेफड़ों में ऐसी गांठे दिखेगी जो कि कैंसर की गांठे प्रतीत होगी किन्तु 99.9 प्रतिशत मामलों में वहां कैंसर की बीमारी से कोई सम्बन्ध नहीं होगा।
ठीक इसी प्रकार 100 स्वस्थ लोगों की किडनी के स्कैन में 23 प्रतिशत लोगों की किडनी में सिस्ट दिखाई दिए जो पहली नजर में कैंसर युक्त प्रतीत हुए, जबकि सही मायने में उनके कैंसर युक्त होने की सम्भावना लगभग 0.05 प्रतिशत ही थी।
इसी प्रकार अगर लीवर के सीटी-स्कैन में लेवल 15 प्रतिशत लोगों में इंसीडेंटल्स मिलेंगे। जिसे पहली नजर में ही डॉक्टर कैंसर बता देंगे किन्तु पुरे मानव के जीवन काल में वे लीवर में इंसीडेंटल्स बिना किसी बदलाव के या शरीर को किसी प्रकार का नुकसान पहुंचाए बिना बस यूं ही पड़े रहेंगे।
तात्पर्य यह है कि अगर आप आधुनिक मशीनों से शरीर के भीतर झाकेंगे तो निश्चित रूप से अवश्य ऐसा कुछ न कुछ मिल जायेगा जो मेडिकल की दुनिया में आपके लिए जानलेवा करार दे दिया जायेगा किन्तु सच तो यही है कि शरीर में विषैली किरणों के माध्यम से अनावश्यक ताक-झाक करना या शरीर के अंगो के साथ छेड़छाड करना आपके लिए घातक सिद्ध हो सकता है।

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